सोमवार, 2 अगस्त 2010

लाश तैरती रहती है

अपने जीवन में,
कितने बोझ ढोता रहता है आदमी,
माता पिता के सपनों का बोझ;
समाज की अपेक्षाओं का बोझ;
पत्नी की इच्छाओं का बोझ;
बच्चों के भविष्य का बोझ;
व्यवसाय या नौकरी में,
आगे बढ़ने का बोझ;
अपनी अतृप्त इच्छाओं का बोझ;
अपने घुट-घुटकर मरते हुए सपनों का बोझ;
कितने गिनाऊँ,
हजारों हैं,
और इन सब से मुक्ति मिलती है,
मरने के बाद;

शायद इसीलिए जिन्दा आदमी पानी में डूब जाता है,
मगर उसकी लाश तैरती रहती है।

1 टिप्पणी:

  1. बढिया रचना है....अपने मनोभावो को बहुत सुन्दर शब्द दिए हैं बधाई।

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