गुरुवार, 31 मार्च 2011

ग़ज़ल : धँस कर दिल में विष फैलाता तेरा कँगना था

धँस कर दिल में विष फैलाता तेरा कँगना था
पत्थर ना हो जाता तो मेरा दिल सड़ना था ॥१॥

मदिरामय कर लूट लिया जिसने वो गैर नहीं
दिल में मेरे रहने वाला मेरा अपना था ॥२॥

कर आलिंगन मुझको जब रोई वो भावुक हो
जाने पल वो सच था या फिर कोई सपना था ॥३॥

बारी बारी साथ मेरा हर रहबर छोड़ गया
एक मुसाफिर था मैं मुझको फिर भी चलना था ॥४॥

जाने अब मैं जिंदा हूँ या गर्म-लहू मुर्दा
प्यार जहर में ना पाता तो मुझको मरना था ॥५॥

फर्क नहीं था जीतूँ या हारूँ मैं इस रण में
अपने दिल के टुकड़े से ही मुझको लड़ना था ॥६॥

9 टिप्‍पणियां:

  1. कर आलिंगन मुझको जब रोई वो भावुक हो
    जाने पल वो सच था या फिर कोई सपना था ॥३
    खुबसूरत शेर मुबारक हो

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  2. aapki is kavita ki jitni tarif ki jaye.kam hai.......bhav prabal kavita ...................ati sundar
    http://kavyana.blogspot.com/2011/03/blog-post_31.html

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  3. कर आलिंगन मुझको जब रोई वो भावुक हो
    जाने पल वो सच था या फिर कोई सपना था ॥३॥

    बारी बारी छोड़ गया हर रहबर साथ मेरा
    एक मुसाफिर था मैं मुझको फिर भी चलना था ॥४॥
    ..
    एक से एक उम्दा शेर ...और उतनी ही गहराई ...मुबारक हो बंधुवर !

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  4. आपकी उम्दा प्रस्तुति कल शनिवार (2.04.2011) को "चर्चा मंच" पर प्रस्तुत की गयी है।आप आये और आकर अपने विचारों से हमे अवगत कराये......"ॐ साई राम" at http://charchamanch.blogspot.com/
    चर्चाकार:Er. सत्यम शिवम (शनिवासरीय चर्चा)

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  5. जाने अब मैं जिंदा हूँ या गर्म-लहू मुर्दा
    प्यार जहर में ना पाता तो मुझको मरना था ॥

    यही तो पता नही आज कौन ज़िन्दा है और कौन नही……………एक दिल को छू जाने वाली गज़ल के लिये बधाई स्वीकारें।

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  6. बारी बारी साथ मेरा हर रहबर छोड़ गया
    एक मुसाफिर था मैं मुझको फिर भी चलना था
    जाने अब मैं जिंदा हूँ या गर्म-लहू मुर्दा
    प्यार जहर में ना पाता तो मुझको मरना था

    सभी शेर एक से बढ़कर एक.....
    खूबसूरत गज़ल ...

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  7. उफ़ क्या मतला और क्या एक से बढ़ कर एक शेर| बहुत खूब धर्मेन्द्र भाई| बधाई स्वीकार करें|

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जो मन में आ रहा है कह डालिए।