बुधवार, 3 अगस्त 2011

कविता : कृष्ण विवर और तुम

क्या?
कैसी लगती हो तुम मुझे?
बता दूँ?
पर विज्ञान का विद्यार्थी हूँ
तुम हँसने लग जाओगी मेरी उपमा पर
पहले वादा करो हँसोगी नहीं
पक्का वादा?
ठीक है
तो मुझे लगता है तुम कृष्ण विवर जैसी हो
अरे हाँ बाबा ‘ब्लैक होल’
क्यूँ?
क्यूँकि जब भी मैं तुम्हारे पास आता हूँ
ऐसा लगता है तुम मुझसे मेरा अस्तित्व छीनने लग गई हो
जैसे मेरा अस्तित्व तुम्हारे अस्तित्व में घुलने लग गया हो
ठीक वैसा ही अनुभव
जैसा किसी पिण्ड को कृष्ण विवर के पास पहुँचने पर होता है

मेरा शरीर तो शरीर
मेरा मन भी तुम्हारे पास आकर
तुम्हारा ही होकर रह जाता है
चाहकर भी तुम्हें छोड़कर जा नहीं पाता
ठीक वैसे जैसे कृष्ण विवर को छोड़कर द्रव्य तो क्या
प्रकाश की तरंगे भी बाहर नहीं निकल पातीं

जब तुम्हें अपनी बाँहों में लेकर
तुम्हारी आँखों में झाँकता हूँ
तो मुझे लगता है जैसे समय रुक गया हो
ठीक वैसे ही जैसे कृष्ण विवर के पास
उसके घटना क्षितिज के पार जाने पर
समय रुक जाता है
दिक्काल का अस्तित्व समाप्त हो जाता है
और इसके बाद क्या होता है
ये दुनिया का कोई सिद्धांत अब तक नहीं बता पाया

क्या?
हाँ ऐसा हो सकता है
कृष्ण विवर दिक्काल की प्रेयसी हो सकता है
क्यूँकि मेरा जो हाल
तुम्हारा साथ करता है
वही सब कृष्ण विवर के कारण दिक्काल के साथ होता है

5 टिप्‍पणियां:

  1. vaah vigyaan aur prem ka milan dikhaai de raha hai aapki kavita me...ek anootha prayog.bahut pasand aaya.

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  2. मुझे लगता है तुम कृष्ण विवर जैसी हो
    अरे हाँ बाबा ‘ब्लैक होल’
    क्यूँ?
    क्यूँकि जब भी मैं तुम्हारे पास आता हूँ
    ऐसा लगता है तुम मुझसे मेरा अस्तित्व छीनने लग गई हो
    जैसे मेरा अस्तित्व तुम्हारे अस्तित्व में घुलने लग गया हो
    ठीक वैसा ही अनुभव
    जैसा किसी पिण्ड को कृष्ण विवर के पास पहुँचने पर होता है
    kya kamaal ka vaigyanik prem vimb hai

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  3. कृष्ण विवर यानि ब्लेक होल आता है.............. अब मालूम पड़ा


    बाक़ायदा हँसाने का भी पूरा पूरा इंतेजाम है इस कविता में

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  4. anokhe ansaz me ye parstuti bahu achchhi lagi...badhiya

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  5. वाह कमाल है प्रेम मे भी वैज्ञानिकता …………बहुत खूब्।

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