शनिवार, 8 अक्तूबर 2011

कविता : मैं देख रहा हूँ

मैं खड़ा हूँ
कृष्ण विवर (black hole) के घटना क्षितिज (event horizon) के ठीक बाहर
मुझे रोक रक्खा है किसी अज्ञात बल ने
और मैं देख रहा हूँ
धरती पर समय को तेजी से भागते हुए

मैं देख रहा हूँ
रंग, रूप, वंश, धन,
जाति, धर्म, देश, तन,
बुद्धि, मृत्यु, समय
सारी सीमाओं को मिटते हुए

मैं देख रहा हूँ
सारी सीमाएँ तोड़कर
मानवता के विराट होते अस्तित्व को
इतना विराट
कि धरती की बड़ी से बड़ी समस्या
इसके सामने अस्तित्वहीन हो गई है

मैं देख रहा हूँ
सूरज को धीरे धीरे ठंढा पड़ते
और इंसानों को दूसरा सौरमंडल तलाशते

मैं देख रहा हूँ
आकाशगंगा के हर ग्रह पर
इंसानी कदमों के निशान बनते

मैं देख रहा हूँ
उत्तरोत्तर विस्तारित होते
दिक्काल (space and time) के धागों को टूटते हुए
ब्रह्मांड की इस चतुर्विमीय (four dimensional) चादर को फटते हुए
और
इंसानों को दिक्काल में एक सुरंग बनाते हुए
जो जोड़ रही है अपने ब्रह्मांड को
एक नए समानांतर ब्रह्मांड (parallel universe) से
जहाँ जीवन की संभावनाएँ
अभी पैदा होनी शुरू ही हुई हैं

मैं देख रहा हूँ
इस ब्रह्मांड के नष्ट हो जाने पर भी
इंसान जिंदा है
और जिंदा है इंसानियत
अपने संपूर्ण अर्जित ज्ञान के साथ
एक नए ब्रह्मांड में

मैं देख रहा हूँ
एक सपना

5 टिप्‍पणियां:

  1. aapne samooche brhmand ko kavita me samihit kar diya....atyant sundr kavita

    उत्तर देंहटाएं
  2. आदर्श का सपना दिखाती एक पोस्ट . लेकिन क्या वास्तव में ऐसा हो पायेगा ? यह बहुत बड़ा प्रश्न है . सपने देखना तो ठीक है लेकिन वहीँ रूक जाने से कुछ नहीं होगा . सपने को सार्थक करने के लिए बहुत कुछ करने की आवश्यकता है . मैं सहयोग देने को तैयार हूँ योजना बनाइये . बहुत से rahi सहयोगी मिल जायेंगे .

    उत्तर देंहटाएं
  3. मैं देख रहा हूँ
    इस ब्रह्मांड के नष्ट हो जाने पर भी
    इंसान जिंदा है
    और जिंदा है इंसानियत
    अपने संपूर्ण अर्जित ज्ञान के साथ
    एक नए ब्रह्मांड में

    अद्भुत दिव्यदृष्टि!

    उत्तर देंहटाएं
  4. आमीन ... काश ये सपना सच हो इंसानियत जीवित रहे ... परब हावी रचना .. नए बिम्ब लिए ..

    उत्तर देंहटाएं

जो मन में आ रहा है कह डालिए।