शुक्रवार, 16 दिसंबर 2011

क्षणिका : आँच

हमारे तुम्हारे बीच
भले ही अब कुछ भी नहीं बचा
मगर तुम्हारे दिल में जल रही लौ से
मैं आजीवन ऊर्जा प्राप्त करता रहूँगा
क्योंकि आँच अर्थात अवरक्त विकिरण को चलने के लिए
किसी माध्यम की आवश्यकता नहीं होती

7 टिप्‍पणियां:

  1. तुम्हारी ऑच



    जैसे धीरे धीरे समा रही है मुझमें



    ठीक उसी तरह



    जैसे धीमी ऑच पर



    रखा हुआ दूध



    जो समय के साथ



    हौले हौले अपने अंदर



    समेट लेता है सारे ताप को



    लेकिन उबलता नहीं



    बस भाप बनकर



    उडता रहता है तब तक



    जब तक अपना



    मृदुल अस्थित्व मिटा नहीं देता



    और बन जाता है



    ठेास और कठोर



    कुछ ऐसे ही सिमट रहा हूँ मैं



    लगातार हर पल

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  2. क्या बात है....
    बहुत सुन्दर...
    सादर...

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  3. वैज्ञानिक तथ्यों को एक भावपूरित कविता में उपमा के रूप में प्रयुक्त करना सुखद लगा।
    सुंदर, बहुत सुंदर....

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जो मन में आ रहा है कह डालिए।