मंगलवार, 19 नवंबर 2013

ग़ज़ल : जब से हुई मेरे हृदय की संगिनी मेरी कलम

बह्र : २२१२ २२१२ २२१२ २२१२

जब से हुई मेरे हृदय की संगिनी मेरी कलम
हर पंक्ति में लिखने लगी आम आदमी मेरी कलम

जब से उलझ बैठी हैं उसकी ओढ़नी, मेरी कलम
करने लगी है रोज दिल में गुदगुदी मेरी कलम

कुछ बात सच्चाई में है वरना बताओ क्यों भला
दिन रात होती जा रही है साहसी मेरी कलम

यूँ ही गले मिल के हैलो क्या कह गई पागल हवा
तब से न जाने क्यूँ हुई है बावरी मेरी कलम

उठती नहीं जब भी किसी का चाहता हूँ मैं बुरा
क्या खत्म करने पर तुली है अफ़सरी मेरी कलम

2 टिप्‍पणियां:

  1. कुछ बात सच्चाई में है वरना बताओ क्यों भला
    दिन रात होती जा रही है साहसी मेरी कलम

    यूँ ही गले मिल के हैलो क्या कह गई पागल हवा
    तब से न जाने क्यूँ हुई है बावरी मेरी कलम

    उठती नहीं जब भी किसी का चाहता हूँ मैं बुरा
    क्या खत्म करने पर तुली है अफ़सरी मेरी कलम

    बहुत बढ़िया कलम आदरणीय

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  2. यूँ ही गले मिल के हैलो क्या कह गई पागल हवा
    तब से न जाने क्यूँ हुई है बावरी मेरी कलम

    उठती नहीं जब भी किसी का चाहता हूँ मैं बुरा
    क्या खत्म करने पर तुली है अफ़सरी मेरी कलम.

    बहुत खूब ... नए रंग में रंगी लाजवाब गज़ल ... ये दोनों शेर तो खास पसंद आए ...

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