शनिवार, 8 मार्च 2014

ग़ज़ल : परों को खोलकर अपने, जो किस्मत आजमाते हैं

बह्र : १२२२ १२२२ १२२२ १२२२

गगन का स्नेह पाते हैं, हवा का प्यार पाते हैं
परों को खोलकर अपने, जो किस्मत आजमाते हैं

फ़लक पर झूमते हैं, नाचते हैं, गीत गाते हैं
जो उड़ते हैं उन्हें उड़ने के ख़तरे कब डराते हैं

परिंदों की नज़र से एक पल गर देख लो दुनिया
न पूछोगे कभी, उड़कर परिंदे क्या कमाते है

फ़लक पर सब बराबर हैं यहाँ नाज़ुक परिंदे भी
लड़ें गर सामने से तो विमानों को गिराते हैं

जमीं कहती, नई पीढ़ी के पंक्षी भूल मत जाना
परिंदे शाम ढलते घोसलों में लौट आते हैं

6 टिप्‍पणियां:

  1. कमाल के शेर हैं धर्मेन्द्र भाई ... जवाब नहीं आपका ... समा बाँध दिया आज तो ...

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  2. परिंदों की नज़र से एक पल गर देख लो दुनिया
    न पूछोगे कभी, उड़कर परिंदे क्या कमाते है

    लाजवाब ग़ज़ल आदरणीय

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