मंगलवार, 22 अप्रैल 2014

ग़ज़ल : तभी जाके ग़ज़ल पर ये गुलाबी रंग आया है

बह्र : १२२२ १२२२ १२२२ १२२२

महीनों तक तुम्हारे प्यार में इसको पकाया है
तभी जाके ग़ज़ल पर ये गुलाबी रंग आया है

अकेला देख जब जब सर्द रातों ने सताया है
तुम्हारा प्यार ही मैंने सदा ओढ़ा बिछाया है

किसी को साथ रखने भर से वो अपना नहीं होता
जो मेरे दिल में रहता है हमेशा, वो पराया है

तेरी नज़रों से मैं कुछ भी छुपा सकता नहीं हमदम
बदन से रूह तक तेरे लिए सबकुछ नुमाया है

कई दिन से उजाला रात भर सोने न देता था
बहुत मजबूर होकर दीप यादों का बुझाया है

12 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी लिखी रचना बुधवार 23 अप्रेल 2014 को लिंक की जाएगी...............
    http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर आप भी आइएगा ....धन्यवाद!

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  2. महीनों तक तुम्हारे प्यार में इसको पकाया है
    तभी जाके ग़ज़ल पर ये गुलाबी रंग आया है

    Waah, Waah! Bahut khoob Sir :-)

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  3. आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति बुधवारीयचर्चा मंच पर ।।

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  4. महीनों तक तुम्हारे प्यार में इसको पकाया है
    तभी जाके ग़ज़ल पर ये गुलाबी रंग आया है .... बहुत सुन्दर
    .. गुलाबी रंग यूँ ही तो सब पर नहीं खिलता!

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  5. कई दिन से उजाला रात भर सोने न देता था
    बहुत मजबूर होकर दीप यादों का बुझाया है..
    खूबसूरत शेर इस लाजवाब गजल का .. आफरीन ...

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जो मन में आ रहा है कह डालिए।