बुधवार, 20 मई 2015

नवगीत : विषधर

नीलकंठ पर
जिसे चढ़ाते
बीत गया बचपन
अब जाना
है बड़ा विषैला
उस कनेर का मन

अंग अंग होता जहरीला
जड़ से पत्तों तक
केवल कोयल, बुलबुल, मैना
का ये हितचिंतक

जो मीठा बोलें
ये बख़्शे उनका ही जीवन

आस पास जब सभी दुखी हैं
सूरज के वारों से
ये विषधर विष चूस रहा है
लू के अंगारों से

छाती फटती है खेतों की
इस पर है सावन

अगर न चढ़ता देवों पर तो
नागफनी सा ये भी
तड़ीपार होता समाज से
बनता मरुथल सेवी

धर्म ओढ़कर बना हुआ है
सदियों से पावन

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