गुरुवार, 18 जून 2015

नवगीत : पत्थर-दिल पूँजी

पत्थर-दिल पूँजी
के दिल पर
मार हथौड़ा
टूटे पत्थर

कितनी सारी धरती पर
इसका जायज़ नाजायज़ कब्ज़ा
विषधर इसके नीचे पलते
किन्तु न उगने देता सब्ज़ा

अगर टूट जाता टुकड़ों में
बन जाते
मज़लूमों के घर

मौसम अच्छा हो कि बुरा हो
इस पर कोई फ़र्क न पड़ता
चोटी पर हो या खाई में
आसानी से नहीं उखड़ता

उखड़ गया तो
कितने ही मर जाते
इसकी ज़द में आकर

छूट मिली इसको तो
सारी हरियाली ये खा जाएगा
नाज़ुक पौधों की कब्रों पर
राजमहल ये बनवाएगा

रोको इसको
वरना इक दिन
सारी धरती होगी बंजर

6 टिप्‍पणियां:

  1. सुन्दर ,सामायिक ,बहुत कुछ सोचने पर मजबूर करते हुए , बेहतरीन अभिब्यक्ति , मन को छूने बाली पँक्तियाँ

    कभी इधर भी पधारें

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  2. सुन्दर नवगीत ... कुछ सच्चाइयों को कहता ...

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  3. सटीक और सुन्दर रचना

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जो मन में आ रहा है कह डालिए।