बुधवार, 24 सितंबर 2014

ग़ज़ल : बदनाम न हो जाय तो किस काम का शायर

बह्र : २२११ २२११ २२११ २२

जो कह न सके सच वो महज़ नाम का शायर
बदनाम न हो जाय तो किस काम का शायर

इंसान का मासूम का मज़लूम का कहिए
अल्लाह का शायर नहीं मैं राम का शायर

कुछ भी हो सजा सच की है मंजूर पर ऐ रब 
मुझको न बनाना कभी हुक्काम का शायर

मज़लूम के दुख दर्द से अश’आर कहूँगा
कहता है जमाना तो कहे वाम का शायर

बच्चे हैं मेरे शे’र तो मक़्ता है मेरी जान
कहते हैं मेरे यार मुझे शाम का शायर

मंगलवार, 16 सितंबर 2014

कविता : हे ईश्वर! अगर तुम न होते

हे ईश्वर!
अगर तुम न होते
तो न होती पुनर्जन्म की अवधारणा
तब मजलूम न ठहराते अपनी गरीबी, अपने दुखों के लिए
पूर्वजन्म के कर्मों को जिम्मेदार
और हर गली, हर सड़क पर तब तक चलता विद्रोह
जब तक गरीबी और दुख जड़ से खत्म न हो जाते

हे ईश्वर!
अगर तुम न होते
तो न होती स्वर्ग या नर्क की परिकल्पना
तब कैसे मजदूरों का हक मारकर बड़ा सा मंदिर बनवाने वाला पूँजीपति
स्वर्ग जाने या दुबारा किसी पूँजीपति के घर में जन्म लेने के बारे में सोच पाता

हे ईश्वर!
अगर तुम न होते
तो दुनिया में न होता पापों से मुक्ति पाने का तरीका
तब सारे पापी अपने पापों के बोझ तले घुट घुटकर मर जाते

हे ईश्वर!
अगर तुम न होते
तो न होती किस्मत की संकल्पना
तब कैसे कोई बलात्कारी या कोई अत्याचारी या ये समाज खुद से कह पाता
कि इस लड़की की किस्मत में यही लिखा था

हे ईश्वर!
अगर तुम न होते
तो न होता कहीं कोई धर्मस्थल
और वो सारे संसाधन जो धर्मस्थलों में व्यर्थ पड़े हैं
काम आते मजलूमों के

हे ईश्वर!
अगर तुम न होते
तो न होता कहीं कोई धर्म
न होती कहीं कोई जाति
धरती पर सिर्फ़ इंसान होता और इंसानियत होती

हे ईश्वर!
अगर तुम न होते
तो दुनिया कितनी अच्छी होती

शनिवार, 13 सितंबर 2014

ग़ज़ल : चीथड़ों को कचरे सा कोठियाँ समझती हैं

बह्र : 212 1222 212 1222 (फाइलुन मुफाईलुन फाइलुन मुफाईलुन)
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सूट बूट को नायक झुग्गियाँ समझती हैं
चीथड़ों को कचरे सा कोठियाँ समझती हैं

आरियों के दाँतों को पल में तोड़ देता है
पत्थरों की कोमलता छेनियाँ समझती हैं

है लिबास उजला पर दूध ने दही बनकर
घी कहाँ छुपाया है मथनियाँ समझती हैं

सर्दियों की ख़ातिर ये गुनगुना तमाशा भर
धूप जानलेवा है गर्मियाँ समझती हैं

कोठियों के भीतर तक ये पहुँच न पायें पर
है कहाँ छुपी शक्कर चींटियाँ समझती हैं

सोमवार, 1 सितंबर 2014

कविता : बहुत कम बचे हैं इंसान

सबसे ताकतवर देश की सबसे ताकतवर कुर्सी पर बैठता है
ताकत से बना आदमी

सबसे शानदार दफ़्तर की सबसे शानदार कुर्सी पर बैठता है
पैसों से बना आदमी

सबसे अच्छे विश्वविद्यालय की सबसे अच्छी कुर्सी पर बैठता है
किताबों से बना आदमी

थोड़ा पैसा, थोड़ी किताब और थोड़ी ताकत से बनता है
बुर्ज़ुआ

थोड़ी किताब, थोड़ी कला, थोड़ा अभिनय, थोड़ा घमंड और थोड़ी अमरत्व की लालसा
इनसे मिलजुलकर बनता है कलाकार
और इन्हीं की मात्रा में थोड़ा घट बढ़ से बन जाता है साहित्यकार

झूठ और पागलपन से बनता है
धर्मगुरु

सबसे बड़े झूठ और सबसे हसीन स्वप्न से बनता है
आतंकवादी

हाड़मांस और पैसों से बनता है
खिलाड़ी

थोड़ा थोड़ा सबकुछ मिलाकर बनता है
मध्यमवर्ग

हड्डियों और आँसुओं से बनता है
गरीब

बहुत कम बचे हैं 
भावनाओं से बने इंसान
मगर इनका नाम कहीं नहीं आता
लुप्तप्राय प्रजातियों की सूची में

मंगलवार, 26 अगस्त 2014

ग़ज़ल : ख़ुदा के साथ यहाँ राम हमनिवाला है

बह्र : मफ़ाइलुन फ़यलातुन मफ़ाइलुन फ़ेलुन (1212 1122 1212 22)

ख़ुदा के साथ यहाँ राम हमनिवाला है
ये राजनीति का सबसे बड़ा मसाला है

जो आपके लिये मस्जिद है या शिवाला है
वो मेरे वास्ते मस्ती की पाठशाला है

सभी रकीब हुये खत्म आपके, अब तो
वो आपको ही डसेगा मियाँ, जो पाला है 

छुपा के राज़ यकीनन रखा है दिल में कोई
तभी तो आप के मुँह पे जड़ा ये ताला है

लगे जो आपको बासी व गैर की जूठन
वही तो देश के मज़लूम का निवाला है

सोमवार, 25 अगस्त 2014

कविता : अंतर्राष्ट्रीय ख्याति का हत्यारा

बचपन से ही कड़ी मेहनत करनी पड़ती है
जमा देने वाली ठंड, उबाल देने वाली गर्मी और बहा ले जाने वाली बरसात
इन सबका सीना तान कर मुकाबला करना पड़ता है

अपने ही हाथों अपने नाते रिश्तेदारों का गला घोंटना पड़ता है
दुनिया के सबसे अच्छे अभिनेता से भी अच्छा अभिनय करना पड़ता है

आत्मा हत्याओं के बोझ तले न दब जाए
इसलिए किसी एक धर्म में अटूट आस्था रखनी पड़ती है
और क्षमा माँगनी पड़ती है ईश्वर से
हर हत्या के बाद

सारे सुबूतों को बड़ी सावधानी से मिटाना पड़ता है
लेकिन सिर्फ़ इतना ही काफ़ी नहीं है
विज्ञान की आधुनिकतम खोजों और तकनीकों को इस्तेमाल किये बगैर
असंभव है अंतर्राष्ट्रीय ख्याति का हत्यारा होना
इसीलिए करोड़ों में से कोई एक
बन पाता है अंतर्राष्ट्रीय ख्याति का हत्यारा

आम आदमी डर कर या चमत्कृत होकर
पूजा करता आया है ऐसे हत्यारों की
हमेशा हमेशा से 

शनिवार, 23 अगस्त 2014

ग़ज़ल : ख़ुदा सा सर्वव्यापी, दरिंदा हो गया है

बह्र : फ़ऊलुन फ़ाइलातुन मफ़ाईलुन फ़ऊलुन (122 2122 122 2122)

प्रबंधन का भी उसको, सलीका हो गया है
ख़ुदा सा सर्वव्यापी, दरिंदा हो गया है

सियासत का है जादू, परिंदों का शिकारी
लगाकर पंख उनके, फरिश्ता हो गया है

मैं सच की रहगुज़र हूँ, कहें तीनों ही राहें
बड़ा भ्रामक वतन का, तिराहा हो गया है

प्रदूषण का असर है, या ए.सी. का करिश्मा
हमारा खून सारा, लसीका हो गया है

हरा भगवा ही केवल, बचे हैं आज इसमें
तिरंगा था कभी जो, दुरंगा हो गया है

बुधवार, 20 अगस्त 2014

अनुवाद : टोमास ट्रांसट्रोमर की कविता ‘हरे टीले की बुलबुल’

हरी आधी रात को उत्तर दिशा में जहाँ तक बुलबुल की आवाज़ जाती है भारी पत्ते मदहोशी में झूमते हैं, बहरी कारें नियान-लाइन की ओर दौड़ती हैं। बुलबुल की आवाज़ बिना काँपे गूँजती है। यह मुर्गे की बाँग जितनी मर्दभेदी है फिर भी खूबसूरत और घमंड से मुक्त है। जब मैं जेल में था ये मुझे देखने आई। तब मैंने ध्यान नहीं दिया था लेकिन अब दे रहा हूँ। समय सूर्य और चन्द्रमा से नीचे बह बहकर सभी टिक टिक करती धड़ियों को धन्यवाद देता है। लेकिन यहाँ आकर समय का अस्तित्व समाप्त हो जाता है। केवल बुलबुल की आवाज़ है जिसके कच्चे स्वरों की झनकार रात में आसमान के चमकते हँसिये पर धार लगा रही है।
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मूल कविता निम्नवत है।

Näktergalen i Badelunda

I den gröna midnatten vid näktergalens nordgräns. Tunga löv hänger i trance, de döva bilarna rusar mot neonlinjen. Näktergalens röst stiger inte åt sidan, den är lika genomträngande som en tupps galande, men skön och utan fåfänga. Jag var i fängelse och den besökte mig. Jag var sjuk och den besökte mig. Jag märkte den inte då, men nu. Tiden strömmar ned från solen och månen och in i alla tick tack tick tacksamma klockor. Men just här finns ingen tid. Bara näktergalens röst, de råa klingande tonerna som slipar natthimlens ljusa lie.

सोमवार, 18 अगस्त 2014

अनुवाद : टोमास ट्रांसट्रोमर की कविता ‘खुले और बंद कमरे’

आदमी दुनिया को अपने काम के दस्ताने से महसूस करता है

मध्याह्न में वो थोड़ी देर के लिए आराम करता है

अपने दस्तानों को ताक पर रखकर

जहाँ वो अचानक बड़े होकर फैलने लगते हैं

और पूरे घर को भीतर से अंधकारमय कर देते हैं

 

अंधकारमय घर वसंत की बयार के बीच बीच में पड़ते हैं

‘आम माफ़ी’ घास फुसफुसाती है ‘आम माफ़ी’

एक लड़का पूरी ताकत से दौड़ता है उस अदृश्य रस्सी पर जो झुकी है

आकाश की ओर

जहाँ उसके भविष्य का सुनहरा स्पप्न उड़ रहा है एक पतंग की तरह

जो किसी कस्बे से भी बड़ी है

 

और उत्तर दिशा में ऊँचाई से आप देख सकते हैं अंतहीन नीला

मुलायम लकड़ी का कालीन

जहाँ बादलों की छाँव

स्थिर है

नहीं, आगे बढ़ रही है

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मूल कविता निम्नवत है।

Öppna och slutna rum

En man känner på världen med yrket som en handske.
Han vilar en stund mitt på dagen och har lagt ifrån sig
handskarna på hyllan.
Där växer de plötsligt, breder ut sig
och mörklägger hela huset inifrån.

Det mörklagda huset är mitt ute bland vårvindarna.
»Amnesti« går viskningen i gräset: »amnesti«.
En pojke springer med en osynlig lina som går snett
upp i himlen
där hans vilda dröm om framtiden flyger som en drake
större än förstaden. Längre norrut ser man från en höjd den blå oändliga
barrskogsmattan
där molnskuggorna
står stilla.
Nej, flyger fram.

शनिवार, 16 अगस्त 2014

अनुवाद : टोमास ट्रांसट्रोमर की कविता ‘दबाव में’

नीले स्वर्ग के इंजनों की गड़गड़ाहट बहुत तेज है
हम काँपती हुई ज़मीन पर मौजूद हैं
जहाँ समुद्र अचानक गहरा हो जाता है -
सीपियाँ और टेलीफोन हवा की आवाज़ सुनाते हैं

सौंदर्य को बस एक दिशा से जल्दबाजी में देखा जा सकता है
खेत में सघन मक्का, एक पीली धारा में अनेक रंग
मेरे दिमाग में मौजूद बेचैन साये इसी जगह उकेरे जाते हैं
जो मक्के में रेंगकर सोना बन जाना चाहते हैं

अंधेरा हो जाता है। मैं आधी रात में सोने जाता हूँ
बड़ी नाव से छोटी नाव बाहर निकलती है
पानी पर आप अकेले हैं
समाज का काला पेंदा धीरे धीरे दूर होता जा रहा है
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मूल कविता निम्नवत है।

Under tryck

Den blå himlens motordån är starkt.
Vi är närvarande på en arbetsplats i darrning,
där havsdjupet plötsligt kan uppenbara sig –
snäckor och telefoner susar.

Det sköna hinner man bara se hastigt från sidan.
Den täta säden på åkern, många färger i en gul ström.
De oroliga skuggorna i mitt huvud dras dit.
De vill krypa in i säden och förvandlas till guld.

Mörkret faller. Vid midnatt går jag till sängs.
Den mindre båten sätts ut från den större båten.
Man är ensam på vattnet.
Samhällets mörka skrov driver allt längre bort.