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सोमवार, 29 सितंबर 2025

ग़ज़ल : देश की बदक़िस्मती थी चार व्यापारी मिले

बह्र : 2122 2122 2122 212

देश की बदक़िस्मती थी चार व्यापारी मिले
झूठ, नफ़रत, छल-कपट से जैसे गद्दारी मिले

बक रहे वाही-तबाही संत सारे लंठ बन
धर्म सम्मेलन में अब दंगों की तैयारी मिले

रोशनी बाँटी जिन्होंने जिस्म उनका जल गया
और अँधेरा बेचने वालों को सरदारी मिले

कौन सी चौखट पे जाएँ सच बताने जब हमें
निर्वसन राजा मिला नंगे ही दरबारी मिले

ख़ूब मँहगाई बढ़ी तो आदमी सस्ता हुआ
चंद सिक्कों की खनक पर अब वफ़ादारी मिले

क़त्ल होने को यहाँ बस सत्य कहना है बहुत
हर गली-कूचे में दुबकी आज अय्यारी मिले

3 टिप्‍पणियां:

  1. आपने कम शब्दों में आज के सामाजिक और राजनीतिक माहौल पर तीखा व्यंग्य किया है। हर शेर अपने आप में एक सवाल भी उठाता है और सोचने पर मजबूर भी करता है। बहरहाल, मेरा यहाँ आने का एक कारण और भी है। हम लोग मुंशी प्रेमचंद जी की आगामी पुण्यतिथी ३१ जुलाई २०२६ के अवसर पर प्रेमचंद महोत्सव के अंतर्गत "५० दिनों में ५० कहानियाँ" बनाने, सुनाने (और जुटाने की भी!) की ओर प्रयासरत है. अगर आपकी रूचि हो तो इस अभियान में आपका सहर्ष स्वागत है.

    अधिक जानकारी आपको यहाँ मिल जाएगी - HindiDiscussionForum dot com
    धन्यवाद!

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