लड़कियाँ तभी गाली देती हैं
जब उन्हें यह डर नहीं लगता
कि उनकी ज़बान से उनका चरित्र नाप लिया जाएगा
बाप के सामने नहीं
वहाँ बेटी की हर गाली
बाप की परवरिश पर प्रश्न बन जाती है
भाई के सामने नहीं
वहाँ बहन की ज़बान पर
भाई का अदृश्य नियंत्रण टूटने लगता है
पति के सामने तो बिल्कुल नहीं
वहाँ पति के भीतर
एक जज बैठा होता है
इसलिए वह बोलती कम है, सोचती ज़्यादा है
हर शब्द से पहले
अपने भीतर की पुलिस से पूछती है
“यह कहना सुरक्षित है क्या?”
फिर किसी करीबी के सामने
एक दिन अचानक गाली देने लगती है
हँसती है, चौंकती है
कि मैंने कुछ अश्लील कहा
और मुझे चरित्रहीन नहीं कहा गया
असल में
उस दिन उसका खुद पर लगाया पहरा टूटता है
जिस घर में लड़की अपनी स्वाभाविक भाषा भी न बोल सके
वहाँ दीवारें भले साफ़ हों
हवा सड़ी हुई होती है
और जिस आदमी के सामने
लड़की बिना डर के
अपनी सबसे गंदी भाषा बोल सके
उसी के सामने
वह अपने सबसे मानवीय रूप में होती है
वाह
जवाब देंहटाएंये एक नजरिया है। कभी कभी लड़की को सीखना पड़ता है - कि पहरेदारी उसके अंदर है, बाहर नहीं। दुनिया को तो यूं भी जज बन कर बैठना है। जो मन आए, करो।
जवाब देंहटाएंसुंदर प्रस्तुति
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