मंगलवार, 16 सितंबर 2014

कविता : हे ईश्वर! अगर तुम न होते

हे ईश्वर!
अगर तुम न होते
तो न होती पुनर्जन्म की अवधारणा
तब मजलूम न ठहराते अपनी गरीबी, अपने दुखों के लिए
पूर्वजन्म के कर्मों को जिम्मेदार
और हर गली, हर सड़क पर तब तक चलता विद्रोह
जब तक गरीबी और दुख जड़ से खत्म न हो जाते

हे ईश्वर!
अगर तुम न होते
तो न होती स्वर्ग या नर्क की परिकल्पना
तब कैसे मजदूरों का हक मारकर बड़ा सा मंदिर बनवाने वाला पूँजीपति
स्वर्ग जाने या दुबारा किसी पूँजीपति के घर में जन्म लेने के बारे में सोच पाता

हे ईश्वर!
अगर तुम न होते
तो दुनिया में न होता पापों से मुक्ति पाने का तरीका
तब सारे पापी अपने पापों के बोझ तले घुट घुटकर मर जाते

हे ईश्वर!
अगर तुम न होते
तो न होती किस्मत की संकल्पना
तब कैसे कोई बलात्कारी या कोई अत्याचारी या ये समाज खुद से कह पाता
कि इस लड़की की किस्मत में यही लिखा था

हे ईश्वर!
अगर तुम न होते
तो न होता कहीं कोई धर्मस्थल
और वो सारे संसाधन जो धर्मस्थलों में व्यर्थ पड़े हैं
काम आते मजलूमों के

हे ईश्वर!
अगर तुम न होते
तो न होता कहीं कोई धर्म
न होती कहीं कोई जाति
धरती पर सिर्फ़ इंसान होता और इंसानियत होती

हे ईश्वर!
अगर तुम न होते
तो दुनिया कितनी अच्छी होती

10 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत हि सुंदर , सज्जन भाई धन्यवाद !
    Information and solutions in Hindi ( हिंदी में समस्त प्रकार की जानकारियाँ )
    आपकी इस रचना का लिंक दिनांकः 18 . 9 . 2014 दिन गुरुवार को I.A.S.I.H पोस्ट्स न्यूज़ पर दिया गया है , कृपया पधारें धन्यवाद !

    उत्तर देंहटाएं
  2. सार युक्त रचना के लिए बधाई |

    उत्तर देंहटाएं
  3. Is ek agar mein hi to chupa hai sab kuch ...
    Agar ye agar hi n hota to asan ho jata sab kuch ...

    उत्तर देंहटाएं

जो मन में आ रहा है कह डालिए।