गुरुवार, 9 अक्तूबर 2014

कविता : बच्चे

बच्चों को शरारत करने दो बच्चों की तरह
बच्चों को बच्चों की तरह खुलकर हँसने और रोने दो

बच्चों को बात करने दो बच्चों की तरह
बच्चों को बच्चों की तरह लड़ने दो

बच्चों को खेलने दो बच्चों की तरह
बच्चों को बच्चों की तरह जिद करने दो

बच्चों को बच्चों की तरह सोने दो
गहरी नींद में

बच्चों को बच्चों की तरह सीखने दो
समय के शिक्षक से

बच्चे कभी बड़े नहीं होते
यदि उनको ज़बरन बड़ा करने की कोशिश की जाय
तो बच्चे बचपन में ही मर जाते हैं

8 टिप्‍पणियां:

  1. जीवन की इस आपाधापी में बचपन की स्मृतियों को पुनर्जीवित करने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद एवं अभिनन्दन | आज की व्यस्ततम जीवनचर्या में विलुप्त होते निश्छल,कोमल बचपन को सहेजने की प्रेरणादायक सुन्दर रचना |

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  2. मेरा तो मन करता है आज भी बच्चा हो सकूं तो बन जाऊं ...
    लाजवाब गहरे भाव लिए रचना ...

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जो मन में आ रहा है कह डालिए।