शुक्रवार, 13 फ़रवरी 2015

ग़ज़ल : भाव मिले जीवन-कविता में तो तुक जाता है

बह्र : २२ २२ २२ २२ २२ २२ २

रोज़ बदलती इस दुनिया में जो रुक जाता है
तन से मन से रिसते रिसते वो चुक जाता है

आँधी आती है तो जान बचाने की ख़ातिर
जो जितना ऊँचा उतनी जल्दी झुक जाता है

दो के झगड़े में होता नुकसान तीसरे का
आँखें लड़ती हैं आपस में दिल ठुक जाता है

अपने ही देते हैं सबसे ज़्यादा दर्द हमें
चमड़ी के दिल तक चमड़े का चाबुक जाता है

माँ, पत्नी अब साथ नहीं रह सकती हैं ‘सज्जन’
भाव मिले जीवन-कविता में तो तुक जाता है

4 टिप्‍पणियां:

  1. अपने ही देते हैं सबसे ज़्यादा दर्द हमें
    चमड़ी के दिल तक चमड़े का चाबुक जाता है ..
    कितना सच कह गए इस एक शेर में ही ... बहुत उम्दा ...

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