रविवार, 24 अप्रैल 2011

कविता : चिकनी मिट्टी और रेत

चिकनी मिट्टी के नन्हें नन्हें कणों में
आपसी प्रेम और लगाव होता है
हर कण दूसरों को अपनी ओर
आकर्षित करता है
और इसी आकर्षण बल से
दूसरों से बँधा रहता है

रेत के कण आकार के अनुसार
चिकनी मिट्टी के कणों से बहुत बड़े होते हैं
उनमें बड़प्पन और अहंकार होता है
आपसी आकर्षण नहीं होता
उनमें केवल आपसी घर्षण होता है

चिकनी मिट्टी के कणों के बीच
आकर्षण के दम पर
बना हुआ बाँध
बड़ी बड़ी नदियों का प्रवाह रोक देता है,
चिकनी मिट्टी बारिश के पानी को रोककर
जमीन को नम और ऊपजाऊ बनाए रखती है;

रेत के कणों से बाँध नहीं बनाए जाते
ना ही रेतीली जमीन में कुछ उगता है
उसके कण अपने अपने घमंड में चूर
अलग थलग पड़े रह जाते हैं बस।

14 टिप्‍पणियां:

  1. रेत के कणों से बाँध नहीं बनाए जाते
    ना ही रेतीली जमीन में कुछ उगता है
    उसके कण अपने अपने घमंड में चूर
    अलग थलग पड़े रह जाते हैं बस।... waah
    apni is rachna ko vatvriksh ke liye parichay tasweer blog link ke saath rasprabha@gmail.com per bhejiye

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  2. वैज्ञानिक द्रष्टिकोण से आपसी प्रेम का विश्लेषण , बहुत सुन्दर बधाई

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  3. आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
    प्रस्तुति भी कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
    कल (25-4-2011) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट
    देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
    अवगत कराइयेगा और हमारा हौसला बढाइयेगा।

    http://charchamanch.blogspot.com/

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  4. रेत के कण और चिकनी मिटटी का आकर्षण ...
    एक जोड़े रखता है , एक जोड़ नहीं सकता ...
    नवीन बिम्बों से रची रचना ...
    सुन्दर !

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  5. अच्छा लगा कविता में विज्ञान का साथ
    आभार

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  6. रेत के कणों से बाँध नहीं बनाए जाते
    ना ही रेतीली जमीन में कुछ उगता है
    उसके कण अपने अपने घमंड में चूर
    अलग थलग पड़े रह जाते हैं बस।...

    अद्भुत सोच...बहुत सार्थक और प्रेरक प्रस्तुति...बहुत सुन्दर

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  7. रेत के कणों से बाँध नहीं बनाए जाते
    ना ही रेतीली जमीन में कुछ उगता है
    उसके कण अपने अपने घमंड में चूर
    अलग थलग पड़े रह जाते हैं बस।

    बहुत ही सशक्त भाव हैं धर्मेन्द्र जी .....

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  8. रेत और चिकनी मिटटी के माध्यम से कितनी गहरी बात कह दी आपने... बहुत खूब.....

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  9. आदरणीय रश्मि जी, सुनील जी, वंदना जी, वाणी जी, उदय वीर सिंह जी, रचना जी, कैलाश जी, हीर जी, अनामिका जी और वंदना महतो जी रचना पसंद करने के लिए आप सबका बहुत बहुत धन्यवाद।

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  10. धर्मेन्द्र भाई अद्भुत कविता है ये
    अलग हट के वाली

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  11. रेत के कणों से बाँध नहीं बनाए जाते
    ना ही रेतीली जमीन में कुछ उगता है
    उसके कण अपने अपने घमंड में चूर
    अलग थलग पड़े रह जाते हैं बस।
    alag soch shayad hi kisine aesa socha hoga
    bahut achchhi kavita
    saader
    rachana

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  12. नवीन भाई और रचना जी आपको बहुत बहुत धन्यवाद रचना पसंद करने के लिए।

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