सोमवार, 31 अक्तूबर 2011

कविता : सगाई के बाद और शादी से पहले

हवा में तैरते हैं प्रेम-गीत
धूप लेकर आती है रेशमी छुवन
रात सजती है रोज नई दुल्हन सी
गेंदे के फूल से उठती है गुलाब की खुशबू
साँस लेने लगती हैं मंदिर की मूर्तियाँ
कण कण में दिखने लगता है ईश्वर
हर पल मन शुक्रिया अदा करता है ईश्वर का
मानव तन देने के लिए
सगाई के बाद और शादी से पहले

नवयुवकों!
इस समय की हर बूँद को
यादों के घड़े में इकट्ठा करके रखना
क्योंकि इस समय की हर बूँद
वक्त गुजरने के साथ
बनती जाती है दुनिया की सबसे नशीली शराब
जो काम आती है उस समय
जब ऊब होने लगती है
समय से

2 टिप्‍पणियां:

  1. साँस लेने लगती हैं मंदिर की मूर्तियाँ
    कण कण में दिखने लगता है ईश्वर...
    वाह! धर्मेन्द्र भाई... सुन्दर रचना...
    सादर बधाई...

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