रविवार, 18 मार्च 2012

हास्य ग़ज़ल : उदर में खार बन उगता तुम्हारी माँ का हर व्यंजन

न पक्की छत अगर बनती तो मैं छप्पर बना लेता
जगह देती तो तेरे दिल में अपना घर बना लेता

मैं अक्सर सोचता हूँ इडलियाँ ये देख गालों की
के मौला काश खुद को आज मैं साँभर बना लेता

तुम इतने ध्यान से समझोगी गर मालूम ये होता
मैं अपने आप को एक्ज़ाम का पेपर बना लेता

बता देती के तेरा बाप रखता है दुनाली भी
तो घर के सामने तेरे मैं इक बंकर बना लेता

उदर में खार बन उगता तुम्हारी माँ का हर व्यंजन
न गर मैं सींच दारू से इसे बंजर बना लेता

6 टिप्‍पणियां:

  1. इक और जोरदार प्रस्तुति ।।

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  2. हास्य टिप्पणी - गंभीर हो गई ।।


    जहर बुझी बातें करें, जब प्राणान्तक चोट ।
    जहर-मोहरा पीस के, लूँ दारू संग घोट ।
    लूँ दारू संग घोट, पोट न तुमको पाया।
    मुझमे थी सब खोट, आज मै खूब अघाया ।
    प्रश्न-पत्र सा ध्यान, लगाकर व्यर्थे ताका ।
    अब सांसत में जान, रोज ही फटे फटाका ।।

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  3. रची उत्कृष्ट |
    चर्चा मंच की दृष्ट --
    पलटो पृष्ट ||

    बुधवारीय चर्चामंच
    charchamanch.blogspot.com

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  4. बहुत मजेदार प्रस्तुति...

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जो मन में आ रहा है कह डालिए।