शनिवार, 23 अगस्त 2014

ग़ज़ल : ख़ुदा सा सर्वव्यापी, दरिंदा हो गया है

बह्र : फ़ऊलुन फ़ाइलातुन मफ़ाईलुन फ़ऊलुन (122 2122 122 2122)

प्रबंधन का भी उसको, सलीका हो गया है
ख़ुदा सा सर्वव्यापी, दरिंदा हो गया है

सियासत का है जादू, परिंदों का शिकारी
लगाकर पंख उनके, फरिश्ता हो गया है

मैं सच की रहगुज़र हूँ, कहें तीनों ही राहें
बड़ा भ्रामक वतन का, तिराहा हो गया है

प्रदूषण का असर है, या ए.सी. का करिश्मा
हमारा खून सारा, लसीका हो गया है

हरा भगवा ही केवल, बचे हैं आज इसमें
तिरंगा था कभी जो, दुरंगा हो गया है

20 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुंदर प्रस्तुति.
    इस पोस्ट की चर्चा, रविवार, दिनांक :- 24/08/2014 को "कुज यादां मेरियां सी" :चर्चा मंच :चर्चा अंक:1715 पर.

    उत्तर देंहटाएं
  2. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।

    उत्तर देंहटाएं
  3. प्रदूषण का असर है, या ए.सी. का करिश्मा
    हमारा खून सारा, लसीका हो गया है

    बहुत खूब कही ग़ज़ल खूब कही।

    उत्तर देंहटाएं
  4. हरा भगवा ही केवल, बचे हैं आज इसमें
    तिरंगा था कभी जो, दुरंगा हो गया है ..
    बहुत खूब ... अभि तो ६५ साल ही हुए हैं तिरंगे से दुरंगा हुआ है ... ऐसे ही देश का चलन रहा तो बदरंगा न हो जाएँ ... लाजवाब शेर ...

    उत्तर देंहटाएं

जो मन में आ रहा है कह डालिए।