बुधवार, 9 सितंबर 2009

मैंनें ईश्वर को मन्दिर में

मैंने ईश्वर को मंदिर में, बिलख-बिलख रोते देखा है।

 

पत्र, पुष्प, गंगाजल-पूरित, ताम्र-पात्र से स्नान कर रहे,

धूप, दीप, नैवेद्य, दुग्ध औ’ चरणामृत का पान कर रहे,

इक छोटे काले पत्थर को, ईश्वर पर हँसते देखा है।

 

मंदिर के बाहर वट-नीचे, गन्दा फटा वस्त्र फैलाकर,

उस ईश्वर के एक अंश को, क्षुधा-प्यास से व्याकुल होकर,

लोगों की फेंकी जूठन भी, बिन-बिन कर खाते देखा है।

 

दीवारों पर कबसे बैठीं, निर्धन-निर्बल की चाहों को,

पूरी कर देने की उस ईश्वर की कोमल इच्छाओं को,

जय-जय की पागल ध्वनियों में दब, घुटकर मरते देखा है।

 

स्वर्ग-नर्क की जंजीरों से, पाप-पूण्य की तस्वीरों में,

बुरी तरह से कैद हो गये, भोले ईश्वर के हाथों में,

विश्व-प्रेम के सूर्ख-जलज को, मैंने कुम्हलाते देखा है।

 

मन्दिर के ही एक अंधेरे, सीलन भरे, किसी कोने में,

नफरत-स्वार्थ और पापों के, भालों से छलनी सीने में-

से बहकर प्रभु-अमिय-रक्त को मिट्टी में मिलते देखा है।

 

तड़प रहे ईश्वर की चुपके-चुपके से फिर चिता जलाकर,

और राख में धर्म-जाति की घृणा-स्वार्थ का ज़हर मिलाकर,

कथित धर्मगुरुओं को फिर से, धर्म ग्रन्थ लिखते देखा है।


1 टिप्पणी:

  1. achchha laga! yah
    मन्दिर के बाहर वट नीचे, गंदा फटा वस्त्र फैलाकर

    क्षुधा, पिपासा से व्याकुल हो, उस इश्वर के एक अंश को

    लोगों की फेंकी जूठन भी, बिनबिनकर खाते देखा है

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