सोमवार, 29 नवंबर 2010

विज्ञान के विद्यार्थी का प्रेम गीत

एक बहुत पुरानी रचना है आप भी आनंद लीजिए

अवकलन समाकलन
फलन हो या चलन-कलन
हरेक ही समीकरन
के हल में तू ही आ मिली

घुली थी अम्ल क्षार में
विलायकों के जार में
हर इक लवण के सार में
तु ही सदा घुली मिली

घनत्व के महत्व में
गुरुत्व के प्रभुत्व में
हर एक मूल तत्व में
तु ही सदा बसी मिली

थीं ताप में थीं भाप में
थीं व्यास में थीं चाप में
हो तौल या कि माप में
सदा तु ही मुझे मिली

तुझे ही मैंने था पढ़ा
तेरे सहारे ही बढ़ा
हुँ आज भी वहीं खड़ा
जहाँ मुझे थी तू मिली

6 टिप्‍पणियां:

  1. घुली थी अम्ल क्षार में
    विलायकों के जार में
    हर इक लवण के सार में
    तु ही सदा घुली मिली

    साइंटिफिक शब्दों के साथ मन के भाव यूं उतारे आपने .... बहुत खूब... प्रभावी बन पड़ी है रचना

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  2. थीं ताप में थीं भाप में
    थीं व्यास में थीं चाप में
    हो तौल या कि माप में
    सदा तु ही मुझे मिली
    बहुत खूब ....अच्छा प्रयोग है...निरंतर लेखन के लिए शुभकामनायें
    चलते -चलते पर आपका स्वागत है

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