सोमवार, 9 मई 2011

ग़ज़ल : चिड़िया की जाँ लेने में इक दाना लगता है

चिड़िया की जाँ लेने में इक दाना लगता है
पालन कर के देखो एक जमाना लगता है ॥१॥

अंधों की सरकार बनी तो उनका राजा भी
आँखों वाला होकर सबको काना लगता है ॥२॥

जय जय के नारों ने अब तक कर्म किए ऐसे
हर जयकारा अब ईश्वर पर ताना लगता है ॥३॥

कुछ भी पूछो इक सा बतलाते सब नाम पता
तेरा कूचा मुझको पागलखाना लगता है ॥४॥

दूर बजें जो ढोल सभी को लगते हैं अच्छे
गाँवों का रोना दिल्ली को गाना लगता है ॥५॥

कल तक झोपड़ियों के दीप बुझाने का मुजरिम
सत्ता पाने पर अब वो परवाना लगता है ॥६॥

टूटेंगें विश्वास कली से मत पूछो कैसा
यौवन देवों को देकर मुरझाना लगता है ॥७॥

जाँच समितियों से करवाकर कुछ ना पाओगे
उसके घर में शाम सबेरे थाना लगता है॥८॥

3 टिप्‍पणियां:

  1. उफ़ ………………आपने तो सारा कच्चा चिट्ठा खोल दिया…………करारा व्यंग्य सोचने को मजबूर करता है ……………शानदार रचना के लिये बधाई।

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  2. बहुत सटीक व्यंग..ज़बरदस्त चोट आज की व्यवस्था पर..बहुत सार्थक और सुन्दर रचना..

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जो मन में आ रहा है कह डालिए।