मंगलवार, 17 मई 2011

कविता : हम-तुम

हम-तुम
जैसे सरिया और कंक्रीट
दिन भर मैं दफ़्तर का तनाव झेलता हूँ
और तुम घर चलाने का दबाव

इस तरह हम झेलते हैं
जीवन का बोझ
साझा करके

किसी का बोझ कम नहीं है
न मेरा न तुम्हारा

झेल लेंगें हम
आँधी, बारिश, धूप, भूकंप, तूफ़ान
अगर यूँ ही बने रहेंगे
इक दूजे का सहारा

6 टिप्‍पणियां:

  1. झेल लेंगें हम
    आँधी, बारिश, धूप, भूकंप, तूफ़ान
    अगर यूँ ही बने रहेंगे
    इक दूजे का सहारा......
    साझा विश्वास है, तो कुछ भी मुश्किल नहीं

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  2. इंजीनियर बाबू की बेहद खूबसूरत कविता........इसे संकलन का हिस्सा ज़रूर बनाना बन्धु|

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  3. सरिया और कंक्रीट .........तनाव और दबाव

    बहुत सुन्दर अंदाज़ में लिखी आपकी रचना , यथार्थ को बड़ी आसानी से व्याख्यायित करने में सक्षम है |

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  4. बस ये विश्वास बना रहे कुछ भी कठिन नहीं है .......
    अच्छी प्रस्तुति...
    आभार !

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  5. रश्मि जी, सुषमा जी, नवीन भाई, सुरेंद्र जी और निवेदिता जी आप सबका बहुत बहुत धन्यवाद

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जो मन में आ रहा है कह डालिए।