गुरुवार, 11 अगस्त 2011

नवगीत : आदमी अकेला है

यंत्रों के जंगल में
जिस्मों का मेला है
आदमी अकेला है

चूहों की भगदड़ में
स्वप्न गिरे हुए चूर
समझौतों से डरकर
भागे आदर्श दूर
खाई की ओर चला
भेड़ों का रेला है

मुट्ठी भर पेड़ खड़े
खोजें, पहचान कहाँ?
नंगापन ले लेगा
इनकी भी जान यहाँ
सुंदर तन है सोना
सीरत अब धेला है

शोर बहा गली सड़क
मन की आवाज घुली
यंत्रों से तार जुड़े
रिश्तों की गाँठ खुली
रोए मन दूर खड़ा
विरहा की बेला है

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

जो मन में आ रहा है कह डालिए।