गुरुवार, 27 जून 2013

कविता : हथियार

कुंद चाकू पर धार लगाकर
हम चाकू से छीन लेते हैं उसके हिस्से का लोहा
और लोहे का एक सीदा सादा टुकड़ा
हथियार बन जाता है

जमीन से पत्थर उठाकर
हम छीन लेते हैं पत्थर के हिस्से की जमीन
और इस तरह पत्थर का एक भोला भाला टुकड़ा
हथियार बन जाता है

लकड़ी का एक निर्दोष टुकड़ा
हथियार तब बनता है जब उसे छीला जाता है
और इस तरह छीन ली जाती है उसके हिस्से की लकड़ी

बारूद हथियार तब बनता है
जब उसे किसी कड़ी वस्तु में कस कर लपेटा जाता है
और इस तरह छीन ली जाती है उसके हिस्से की हवा

पर दुनिया का सबसे खतरनाक हथियार
इन तरीकों से नहीं बनता
वो बनता है उस पदार्थ को और न्यूट्रॉन देने से
जिसके पास पहले से ही मौजूद न्यूट्रॉनों को
रखने हेतु जगह कम पड़ रही है

हजारों वर्षों से धरती पर मौजूद हैं छोटे हथियार
इसलिए मुझे यकीन है
दुनिया जब भी खत्म होगी
कम से कम छोटे हथियारों से तो नहीं होगी

4 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा शनिवार(29-6-2013) के चर्चा मंच पर भी है ।
    सूचनार्थ!

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  2. आदिकाल से ही किसी वस्तु को अपने उपयोग में लाने का इंसानी फितरत अब कहाँ बदलने वाली ...वही हथियार जब अपने ऊपर इस्तेमाल होते है तो फिर देखते हो दुनिया में क्या होता है ...
    बहुत बढ़िया चिंतनशील रचना

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  3. बहुत पसन्द आया
    हमें भी पढवाने के लिये हार्दिक धन्यवाद

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