गुरुवार, 5 दिसंबर 2013

ग़ज़ल : क्यूँ जाति की न अब भी दीवार टूटती है

बह्र : २२१ २१२२ २२१ २१२२
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इक दिन हर इक पुरानी दीवार टूटती है
क्यूँ जाति की न अब भी दीवार टूटती है

इसकी जड़ों में डालो कुछ आँसुओं का पानी
धक्कों से कब दिलों की दीवार टूटती है

हैं लोकतंत्र के अब मजबूत चारों खंभे
हिलती है जब भी धरती दीवार टूटती है

हथियार ले के आओ, औजार ले के आओ
कब प्रार्थना से कोई दीवार टूटती है

रिश्ते बबूल बनके चुभते हैं जिंदगी भर
शर्मोहया की जब भी दीवार टूटती है

4 टिप्‍पणियां:

  1. लाजवाब बहर में कमाल गजल ... दूसरा शेर तो सीघे दिल में उतर गया ...

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  2. लोगों कि इज्जत बड़ी छोटी हो गयी है, प्यार कर लेने से घटने लगती है माध्यम वर्गीय परिवारों कि इज्जत, बेहद खूबसूरत गजल

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  3. बेहद खूबसूरत गजल
    उत्कृष्ट प्रस्तुति.

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