रविवार, 1 मई 2016

ग़ज़ल : यही सच है कि प्यार टेढ़ा है

बह्र : २१२२ १२१२ २२

ये दिमागी बुखार टेढ़ा है
यही सच है कि प्यार टेढ़ा है

स्वाद इसका है लाजवाब मियाँ
क्या हुआ गर अचार टेढ़ा है

जिनकी मुट्ठी हो बंद लालच से
उन्हें लगता है जार टेढ़ा है

खार होता है एकदम सीधा
फूल है मेरा यार, टेढ़ा है

यूकिलिप्टस कहीं न बन जाये
इसलिए ख़ाकसार टेढ़ा है

6 टिप्‍पणियां:

  1. वाह ... बहुत कमाल के शेर निकाले हैं इस छोटी बहर में ....

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  2. "प्यार" के इस शब्द में ही इसका टेढ़ापन छुपा होता हैं. लेकिन प्यार करने वालों को ये दिखता नहीं.
    nice poem

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  3. Behatarin Kavita.Jivan Ka Sabse Kubsurat Pal Vahi Hota Hain Jab Kisise Pyar Hota Hain.

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