शुक्रवार, 12 अक्तूबर 2012

आलेख : हिग्स बोसॉन का सच


ब्रह्मांड की उत्पत्ति के ‘मानक सिद्धांत’ के अनुसार दिशाएँ, समय, द्रव्य और ऊर्जा इन सबका जन्म आज से 13.7 अरब वर्ष पहले हुए एक महाविस्फोट से हुआ। महाविस्फोट के तुरंत बाद ब्रह्मांड अत्यधिक गर्म और घना था परन्तु तुरंत ही ये ठंढा होना शुरू हुआ। ठंढा होने पर महाविस्फोट के लगभग 10-43 सेकेंड बाद द्रव्य का निर्माण करने वाले मूलभूत कण बनना शुरू हुए। इन कणों को मुख्यतया दो समूहों में विभक्त किया जा सकता है, क्वार्क और लेप्टॉन (इन दोनों समूहों को सम्मिलित रूप से फ़र्मिऑन कहा जाता है)। हर समूह में 6 कण होते हैं। ये कण जोड़ों में होते हैं जिन्हें ‘पीढ़ी’ भी भी कहा जाता है। सबसे हल्के और सबसे स्थायी कणों से पहली पीढ़ी बनती है जबकि भारी और अस्थायी कण दूसरी और तीसरी पीढ़ी का निर्माण करते हैं। ब्रह्मांड के सारे स्थायी द्रव्य का निर्माण पहली पीढ़ी के कणों से हुआ है। दूसरी और तीसरी पीढ़ी के भारी कण शीघ्रता से विघटित होकर पहली पीढ़ी के कणों में बदल जाते हैं।
क्वार्कों की पहली पीढ़ी ‘अप क्वार्क’ एवं ‘डाउन क्वार्क’ से, दूसरी पीढ़ी ‘चार्म क्वार्क’ एवं ‘स्ट्रेंज क्वार्क’ से तथा तीसरी पीढ़ी ‘टॉप क्वार्क’ एवं ‘बॉटम क्वार्क’ से बनती है। इन कणों में विद्युत आवेश, वर्ण आवेश, द्रव्यमान एवं घूर्णन नामक गुण होते हैं।
इसी प्रकार लेप्टॉनों की पहली पीढ़ी ‘इलेक्ट्रान’ एवं ‘इलेक्ट्रान-न्युट्रिनो’ दूसरी पीढ़ी ‘म्युऑन’ एवं ‘म्युऑन-न्युट्रिनो’ तथा तीसरी पीढ़ी ‘टाउ’ एवं ‘टाउ-न्युट्रिनों’ से बनती है। इलेक्ट्रान, म्युऑन एवं टाउ कणों में विद्युत आवेश, द्रव्यमान एवं घूर्णन होता है जबकि न्युट्रिनो उदासीन कण होते हैं जिनका द्रव्यमान नगण्य होता है। इन कणों पर वर्ण आवेश नहीं होता।
ब्रह्मांड के ठंढा होने पर चार मूलभूत बल भी उत्पन्न हुए (ऐसा माना जाता है कि महाविस्फोट के क्षण ऊर्जा घनत्व अत्यधिक होने की स्थिति में एक ही महाबल था जो ब्रह्मांड के ठंढा होने पर चार अलग अलग बलों में बँट गया)। इन चारों बलों को ‘मजबूत नाभिकीय बल’, ‘कमजोर नाभिकीय बल’, ‘विद्युत-चुम्बकीय बल’ एवं ‘गुरुत्वाकर्षण बल’ कहा जाता है। इन चारों बलों की शक्ति एवं सीमा अलग अलग होती है। ये चारों बल अलग अलग वाहक कणों के माध्यम से कार्य करते हैं। इन वाहक कणों को बोसॉन कहा जाता हैं। क्वार्क एवं लेप्टॉन परस्पर बोसॉनों का विनिमय करके ऊर्जा की असतत मात्रा का स्थानांतरण करते हैं।
मजबूत नाभिकीय बल का वाहक ग्लुऑन, कमजोर नाभिकीय बल के वाहक ड्ब्ल्यू एवं ज़ेड बोसॉन एवं विद्युत चुंबकीय बल का वाहक फोटॉन होता है। ग्लुऑन और फोटॉन द्रव्यमान रहित कण होते हैं तथा डब्ल्यू एवं ज़ेड बोसॉन काफी भारी होते हैं। इसी प्रकार गुरुत्वाकर्षण बल का वाहक ‘ग्रेविटॉन’ को माना जाता है, परन्तु अभी तक ग्रेविटॉन की प्रयोगों द्वारा पुष्टि नहीं की जा सकी है।
एक क्षण का दस लाखवाँ हिस्सा बीतते बीतते ब्रह्मांड इतना ठंढा हुआ कि तीन स्थायी क्वार्कों ने मजबूत नाभिकीय बल के प्रभाव में आकर प्रोटॉन (दो अप क्वार्क + एक डाउन क्वार्क) और न्युट्रॉन (एक अप क्वार्क + दो डाउन क्वार्क) का निर्माण किया। प्रोटॉन और न्युट्रऑन कमजोर नाभिकीय बल के प्रभाव में आए और उन्होंने एक साथ आकर नाभिक का निर्माण किया। लगभग 3,80,000 साल बाद नाभिक और इलेक्ट्रॉन विद्युतचुम्बकीय बल के प्रभाव से एक दूसरे से बँध गए और इस तरह आरम्भिक परमाणु बने जो मुख्यतया हीलियम और हाइड्रोजन परमाणु थे। अब भी ब्रह्मांड का ज्यादातर द्रव्य इन्हीं परमाणुओं से मिलकर बना है। इस घटना के लगभग 16 लाख साल बाद गुरुत्वाकर्षण बल का प्रभाव दिखना शुरू हुआ जब इन परमाणुओं से बने बादलों ने गुरुत्व बल से संघनित होकर तारे और आकाशगंगाएँ बनाना शुरू किया। उसके बाद ब्रह्मांड लगातार ठंढा होता रहा और भारी परमाणु जैसे कार्बन, आक्सीजन और लोहा इत्यादि बनने शुरू हुए।
जैसा कि ऊपर कहा जा चुका है कि महाविस्फोट के तुरंत बाद एक ही महाबल था जो बाद में चार अलग अलग बलों में बदल गया। इस प्रकार इन चारों बलों की सम्पूर्ण व्याख्या करने वाला एक ही मूलभूत सिद्धांत होना चाहिए जिससे अलग अलग परिस्थियों में ये चारों बल स्वतः उत्पन्न हों। ब्रह्मांड की उत्पत्ति के मानक सिद्धांत में मजबूत, कमजोर और विद्युत-चुंबकीय बलों का एकीकरण किया जा चुका है और इनकी व्याख्या करने वाले सिद्धांत को ‘वैद्युतकमजोर सिद्धांत’ कहा जाता है। परन्तु वैद्युतकमजोर सिद्धांत की समीकरणें सही हल दें इसके लिए आवश्यक था कि सारे कण द्रव्यमान रहित हों। परन्तु हम जानते हैं कि वास्तव में ज्यादातर कणों में द्रव्यमान होता है। इस दुविधा से निकलने के लिए पीटर हिग्स, राबर्ट ब्राउट एवं फ़्रंक्वाइस एंगलर्ट ने एक समाधान प्रस्तुत किया। उन्होंने सुझाव दिया कि महाविस्फोट के तुरंत बाद सारे कण द्रव्यमान रहित थे। जैसे ही ब्रह्मांड ठंढा हुआ और इसका तापमान एक क्रांतिक ताप से कम हुआ एक अदृश्य बलक्षेत्र अस्तित्व में आया जिसे ‘हिग्स क्षेत्र’ कहते हैं और इस क्षेत्र से संबंधित वाहक कण को ‘हिग्स बोसॉन’ कहते हैं। यह क्षेत्र ब्रह्मांड में हर जगह व्याप्त है। कोई भी कण जब हिग्स क्षेत्र के प्रभाव में आता है तो उसे द्रव्यमान प्राप्त होता है। जो कण जितना अधिक इस क्षेत्र से प्रभावित होता है उसका द्रव्यमान उतना ही अधिक होता है। जो कण हिग्स क्षेत्र से प्रभावित नहीं होते वो द्रव्यमान रहित रहते हैं जैसे फोटॉन एवं ग्लुऑन।
इस विचार ने समस्या का एक संतोषजनक हल सुझाया तथा स्थापित सिद्धातों और घटनाओं के साथ अच्छा तालमेल बिठाया। पर किसी ने कभी हिग्स बोसॉन के अस्तित्व की प्रयोगात्मक पुष्टि नहीं की थी। इस कण की खोज से हमें ये पता चल सकता था कि कणों के द्रव्यमान इतने विशिष्ट क्यों होते हैं। परन्तु दिक्कत ये थी कि हम हिग्स बोसॉन के द्रव्यमान के बारे में पूरी तरह अनभिज्ञ थे। वैद्युतकमजोर सिद्धांत से हमें ये पता चल गया कि इस कण का द्रव्यमान कहाँ से कहाँ तक हो सकता है। इतने द्रव्यमान के कण की प्रयोगात्मक पुष्टि के लिए हमें ढेर सारी ऊर्जा की आवश्यकता थी। ये ऊर्जा केवल सापेक्षिक वेग से गतिमान प्रोटॉनों को एक दूसरे से टकराकर ही प्राप्त की जा सकती थी। इसके लिए महामशीन (लार्ज हेड्रॉन कोलाइडर) का निर्माण किया गया।  
दिनांक 04.07.2012 को महामशीन द्वारा हिग्स बोसॉन के अस्तित्व की प्रयोगात्मक पुष्टि के साथ ही वैद्युतकमजोर सिद्धांत का खोया हुआ हिस्सा मिल गया है। हिग्स बोसॉन का द्रव्यमान 125.3 ± 0.6 जीईवी आँका गया है। इस कण की खोज से ब्रह्मांड की उत्पत्ति के मानक सिद्धांत को बल मिला है। अब वैज्ञानिक कणों के द्रव्यमान की उत्पत्ति संबंधी पहले से मौजूद सिद्धांतों की न केवल जाँच परख कर सकते हैं वरन इस संबंध में नए सिद्धांतों को प्रतिपादित करने का प्रयास भी कर सकते हैं। चौथे एवं आखिरी मूलभूत बल (गुरुत्वाकर्षण बल) को भी वैद्युतकमजोर सिद्धांत के साथ एकीकृत करके एक महासिद्धांत को प्रतिपादित करने के लिए भी नई दिशाएँ खुल गई हैं।
इस कण को ईश्वरीय कण भी कहते हैं और अक्सर लोग ऐसा समझते हैं कि इस कण की खोज से हमारी सारी समस्याएँ हल हो जाएँगी और हम ब्रह्मांड के सारे रहस्यों की व्याख्या करने में सक्षम हो जाएँगें। ऐसा सोचना सही नहीं है क्योंकि ये कण एक बड़ी पहेली का केवल एक छोटा सा हिस्सा है। इस कण के खोजे जाने से हमें पहेली के अन्य हिस्सों को खोजने और पहेली के साथ जोड़ने में थोड़ी आसानी हो जाएगी। अभी इस कण के अन्य गुणों जैसे घूर्णन इत्यादि का अध्ययन बाकी है। बोसॉन कणों का घूर्णन पूर्णांक होता है। मानक सिद्धांत के अनुसार इसका घूर्णन शून्य होना चाहिए किंतु यदि इस कण का घूर्णन शून्य से अलग कोई और पूर्णांक हुआ तो हमें मानक सिद्धांत को संशोधित करने की आवश्यकता पड़ेगी और उस स्थिति में संभवतः श्याम ऊर्जा और श्याम द्रव्य की व्याख्या भी मानक सिद्धांत के आधार पर की जा सकेगी। इसमें कोई संदेह नहीं कि इस कण की खोज ने नई संभावनाओं के द्वार खोल दिए हैं। 

शुक्रवार, 5 अक्तूबर 2012

गुरुवार, 27 सितंबर 2012

नवगीत : टेसू के फूलों के भारी हैं पाँव


टेसू के फूलों के
भारी हैं पाँव

रूप दिया
प्रभु ने पर
गंध नहीं दी
पत्ते भी
छीन लिए
धूप ने सभी

सूरज अब मर्जी से
खेल रहा दाँव

मंदिर में
जगह नहीं
मस्जिद अनजान
घर बाहर
ग्राम नगर
करते अपमान

नहीं मिली छुपने को
पत्ती भर छाँव

रँग अपना
देने को
पिसते हैं रोज
फूलों सा
इनका मन
भूले सब लोग

जंगल की आग कहें
सभ्य शहर गाँव

बुधवार, 19 सितंबर 2012

क्यूँ मैंने ताड़ा नहीं, हुई पड़ोसन रुष्ट (दो कुंडलिया छंद)


बर्तन बतियाने लगे, छूकर तेरे हाथ
चूल्हा मुस्काने लगा, पाकर तेरा साथ
पाकर तेरा साथ जवान हो गए कपड़े
पाया इतना काम मिटे झाड़ू के नखड़े
दीवारें घर बनीं तुम्हीं से कहता ‘सज्जन’
कवि भी अब इंसान बना कहते सब बर्तन

क्यूँ मैंने ताड़ा नहीं, हुई पड़ोसन रुष्ट
लेकिन फिर भी शक करे, मूढ़ पड़ोसी दुष्ट
मूढ़ पड़ोसी दुष्ट न इतना भी पहचाने
वो कविता है और कि जिसके हम दीवाने
कविता नामक नार लगे आलू बोरी ज्यूँ
तिस पर होती रुष्ट नहीं ताड़ा मैंने क्यूँ

गुरुवार, 13 सितंबर 2012

विज्ञान के विद्यार्थी की प्रेम कविता - 7


शब्द तुम्हारे प्रति मेरे प्रेम के अनंततम सूक्ष्म हिस्से को भी व्यक्त नहीं कर सकते
मेरे होंठों को इजाजत दो
वो लिखेंगे तुम्हारी त्वचा पर मेरे प्रेम की भूमिका

भाषा कोई भी हो
दो शब्दों के बीच दूरी न हो तो वो अर्थहीन हो जाते हैं
ये तीन दूर दूर बैठे शब्द क्या व्यक्त करेंगे प्रेम को
ये तो एक दूसरे को छूने से भी डरते हैं

प्रेम तब भी था जब शब्द नहीं थे
प्रेम वो भी करते हैं जिनके पास शब्द नहीं होते
प्रेम का शब्दों से कोई संबंध नहीं होता

तुमको छूकर मैं अपने कुछ इलेक्ट्रॉन तुम्हें दे देता हूँ
और तुमसे तुम्हारे कुछ इलेक्ट्रॉन ले लेता हूँ
इन्हीं इलेक्ट्रॉनों पर लिखा होता है शब्दहीन प्रेम

बाकी सारे शब्द, सारे वाक्य, सारी भाषाएँ, सारे अर्थ
बुद्धिमानों द्वारा प्रेम के नाम पर छल करने के लिए बनाए गए हैं

सुनो! जरा सावधान रहना
प्रेम के मामले में कानों से नहीं त्वचा से सुनना

मंगलवार, 11 सितंबर 2012

ग़ज़ल : जुबाँ मिली फिर भी कब कुछ कह पाता है जूता


जुबाँ मिली फिर भी कब कुछ कह पाता है जूता
इसीलिए पैरों से रौंदा जाता है जूता

शुरुआती विरोध कुछ दिन ही टिकता इसीलिए
फट जाने तक पैरों में फिट आता है जूता

पाँव पकड़ने की आदत जब लग जाती इसको
आजीवन फिर मैल पाँव की खाता है जूता

ईश्वर के चरणों की इज्जत बचा रहा फिर भी
मंदिर के बाहर ही रक्खा जाता है जूता

वफ़ादार कितना भी हो सब देते फेंक इसे
जैसे ही कुछ कहने को मुँह बाता है जूता

गुरुवार, 6 सितंबर 2012

विज्ञान के विद्यार्थी की प्रेम कविता - 6


यार स्पिरिट लैंप ये बता
जब वो तेरे पास खड़ी होकर साँस लेती है
तब भी तेरी लौ हिलती तक नहीं
इतना नियंत्रण कैसे रखता है तू खुद पर

परखनली तू कैसे झेलती है
उसकी उँगलियों में हो रहा कंपन
अनुनादित होना तो दूर तू तो आवाज तक नहीं निकालती

अबे व्हीट स्टोन ब्रिज
उसके सामने भी
तेरा प्रतिरोध वैसे का वैसा कैसे बना रहता है

जरा एसीटोन को देखो
उसके हाथों पर गिरा फिर भी आग नहीं पकड़ी

मैं भी तो उन्हीं तत्वों से बना हूँ
जिनसे ये प्रयोगशाला भरी पड़ी है
फिर भी उसके आने पर मेरी हालत खराब हो जाती है
आखिर ये माजरा क्या है?

सोमवार, 3 सितंबर 2012

विज्ञान के विद्यार्थी की प्रेम कविता - 5

लगता है विज्ञान के विद्यार्थी की प्रेम कविताओं की एक श्रृंखला ही बनानी पड़ेगी। पेश है अगली कविता।

--------------------------------------------------
‘ऋण’
मुझमें से तुमको घटा नहीं सका
‘धन’
तुमको मुझसे जोड़ नहीं सका
‘घात’
से कोई फर्क नहीं पड़ा हमपर
किसी भी ‘आधार’ पर लिया गया ‘लॉग’
कम नहीं कर पाया इस दर्द को
‘अवकलन’
नहीं निकाल सका इसके घटने या बढ़ने की दर
‘समाकलन’
नहीं पहुँच सका उस अनंततम सूक्ष्म स्तर पर
कि निकाल सके इसका क्षेत्रफल और आयतन

गणित और विज्ञान
अपनी सारी शक्ति लगाने के बावजूद
खड़े रह गए मुँह ताकते
उस ढाई आखर को समझने में
जिसे सैकड़ों साल पहले
एक अनपढ़ जुलाहे ने समझ लिया था

बुधवार, 29 अगस्त 2012

ग़ज़ल : हाल-ए-दिल उससे कह पाना सब के बस की बात नहीं


गहराई से वापस आना सबके बस की बात नहीं
सागर तल से मोती लाना सबके बस की बात नहीं

कुछ तो है हम में जो मरते दम तक साथ निभाते हैं
हर दिन रूठा यार मनाना सबके बस की बात नहीं

जादू है उसकी बातों में वरना खुदा कसम मुझसे
अपनी बातें यूँ मनवाना सबके बस की बात नहीं

कुछ बातें, कुछ यादें, कुछ पागल लम्हे ही हैं वरना
जीवन भर मुझको तड़पाना सबके बस की बात नहीं

आशिक ताक रहे दिल अपना लेकर आँखों में लेकिन
हाल-ए-दिल उससे कह पाना सब के बस की बात नहीं

शुक्रवार, 17 अगस्त 2012

कविता : तुम बारिश और पहाड़

बारिश ने पहाड़ों को उनका यौवन लौटा दिया है

दो पास खड़े पहाड़ हरे दुपट्टे के नीचे तुम्हारे वक्ष हैं
मैं धरती द्वारा साँस खींचे जाने की प्रतीक्षा करता हूँ

गोरे पानी से भरी झील तुम्हारी नाभि है
मैं नैतिकता के पिंजरे में फड़फड़ाता हुआ तोता हूँ
जिसे ये रटाया गया है कि गोरे पानी में नहाने से आत्मा दूषित हो जाती है

प्रेम का रंग हरा है

हर बादल को कहीं न कहीं बरसना पड़ता है
मगर सारी बरसातें बादलों से नहीं होती

भीगी पहाड़ी सड़कें तुम्हारे शरीर के गीले वक्र हैं
मैं डरा हुआ नौसिखिया चालक हूँ

डर हिमरेखा है
जिससे ऊपर प्रेम के बादल भी केवल बर्फ़ बरसाते हैं
हरियाली का सौंदर्य इस रेखा के नीचे है

दूब से बाँस तक
हरा सबके भीतर होता है
हरा होने के लिए सिर्फ़ हवा, बारिश और धूप चाहिए

बरसात में गिरगिट भी हरा हो जाता है
उससे बचकर रहना

सारी नदियाँ इस मौसम में तुम्हारे काले बालों से निकलती हैं
फिर भी मेरी प्यास नहीं बुझती

लोग कहते हैं बरसात के मौसम में पहाड़ों का सीजन नहीं होता
हर बारिश में कितने ही पहाड़ आत्महत्या कर लेते हैं

तुम बारिश और पहाड़
जान लेने के लिए और क्या चाहिए