मंगलवार, 4 मार्च 2014

कविता : विकास का कचरा

शराब की खाली बोतल के बगल में लेटी है
सरसों के तेल की खाली बोतल

दो सौ मिलीलीटर आयतन वाली
शीतल पेय की खाली बोतल के ऊपर लेटी है
पानी की एक लीटर की खाली बोतल

दो मिनट में बनने वाले नूडल्स के ढेर सारे खाली पैकेट बिखरे पड़े हैं
उनके बीच बीच में से झाँक रहे हैं सब्जियों और फलों के छिलके

डर से काँपते हुए चाकलेट और टाफ़ियों के तुड़े मुड़े रैपर
हवा के झोंके के सहारे भागकर
कचरे से मुक्ति पाने की कोशिश कर रहे हैं

सिगरेट और अगरबत्ती के खाली पैकेटों के बीच
जोरदार झगड़ा हो रहा है
दोनों एक दूसरे पर बदबू फैलाने का आरोप लगा रहे हैं

यहाँ आकर पता चलता है
कि सरकार की तमाम कोशिशों और कानूनों के बावजूद
धड़ल्ले से इस्तेमाल हो रही हैं पॉलीथीन की थैलियाँ

एक गाय जूठन के साथ साथ पॉलीथीन की थैलियाँ भी खा रही है

एक आवारा कुत्ता बकरे की हड्डियाँ चबा रहा है
वो नहीं जानता कि जिसे वो हड्डियों का स्वाद समझ रहा है
वो दर’असल उसके अपने मसूड़े से रिस रहे खून का स्वाद है

कुछ मैले-कुचैले नर कंकाल कचरे में अपना जीवन खोज रहे हैं

पास से गुज़रने वाली सड़क पर
आम आदमी जल्द से जल्द इस जगह से दूर भाग जाने की कोशिश रहा है
क्योंकि कचरे से आने वाली बदबू उसके बर्दाश्त के बाहर है

एक कवि कचरे के बगल में खड़ा होकर उस पर थूकता है
और नाक मुँह सिकोड़ता हुआ आगे निकल जाता है
उस कवि से अगर कोई कह दे
कि उसके थूकने से थोड़ा सा कचरा और बढ़ गया है
तो कवि निश्चय ही उसका सर फोड़ देगा

ये विकास का कचरा है

शनिवार, 1 मार्च 2014

ग़ज़ल : नयन में प्यार का गौहर सम्हाल रक्खा है


बह्र : १२१२ ११२२ १२१२ २२

सभी से आँख चुराकर सम्हाल रक्खा है
नयन में प्यार का गौहर सम्हाल रक्खा है

कहेगा आज भी पागल व बुतपरस्त मुझे
वो जिसके हाथ का पत्थर सम्हाल रक्खा है

तेरे चमन से न जाए बहार इस खातिर
हृदय में आज भी पतझर सम्हाल रक्खा है

चमन मेरा न बसा, घर किसी का बस जाए
ये सोच जिस्म का बंजर सम्हाल रक्खा है

तेरे नयन के समंदर में हैं भँवर, तूफाँ
किसी के प्यार ने लंगर सम्हाल रक्खा है

तुझे पसंद जो आया सनम वही मैंने
ग़ज़ल में आज भी तेवर सम्हाल रक्खा है

गुरुवार, 27 फ़रवरी 2014

नवगीत : बस प्यार तुम्हारा

घूमूँगा बस प्यार तुम्हारा
तन मन पर पहने
पड़े रहेंगे बंद कहीं पर
शादी के गहने

चिल्लाते हैं गाजे बाजे
चीख रहे हैं बम
जेनरेटर करता है बक बक
नाच रही है रम

गली मुहल्ले मजबूरी में
लगे शोर सहने

सब को खुश रखने की खातिर
नींद चैन त्यागे
देहरी, आँगन, छत, कमरे सब
लगातार जागे

कौन रुकेगा, दो दिन इनसे
सुख दुख की कहने

शालिग्राम जी सर पर बैठे
पैरों पड़ी महावर
दोनों ही उत्सव की शोभा
फिर क्यूँ इतना अंतर

मैं खुश हूँ, यूँ ही आँखो से
दर्द लगा बहने

सोमवार, 24 फ़रवरी 2014

मेरी पहली किताब ‘ग़ज़ल कहनी पड़ेगी झुग्गियों पर’ का विमोचन

आप सबको यह बताते हुए खुशी हो रही है कि मेरी पहली किताब ‘ग़ज़ल कहनी पड़ेगी झुग्गियों पर’ का विमोचन दिनांक 22-02-2014 को सत्य प्रकाश मिश्र सभागार, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय क्षेत्रीय केन्द्र, इलाहाबाद में हुआ। समारोह की तस्वीरें निम्नवत  हैं। जिन मित्रों को ये ग़ज़ल संग्रह चाहिए वे कृपया अपना डाक का पता मुझे [email protected] पर भेज दें।













मंगलवार, 28 जनवरी 2014

मेरी पहली किताब (ग़ज़ल संग्रह) : ग़ज़ल कहनी पड़ेगी झुग्गियों पर


मेरी पहली किताब, जो एक ग़ज़ल संग्रह है, अंजुमन प्रकाशन से छप चुकी है। दिनांक 22-02-2014 को इसका विमोचन सत्य प्रकाश मिश्र सभागार, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय क्षेत्रीय केन्द्र, इलाहाबाद में होना तय हुआ है। आप सभी सादर आमंत्रित हैं। कार्यक्रम का विवरण निम्नवत है।


वर्तमान में यह पुस्तक बिक्री के लिए उपलब्ध है। किताब का मूल्य भारत में मात्र रू 20/- है। पर ये किताब अकेली बिक्री के लिए उपलब्ध नहीं है। इसके लिए आपको आठ पुस्तकों का एक सेट खरीदना होगा जिसकी कीमत बीस रूपये प्रति पुस्तक के हिसाब से रू 160/- रूपया (डाकखर्च रू 60/- अतिरिक्त) है। यह सेट निम्नांकित कड़ी से खरीदा जा सकता है।

http://www.ebay.in/itm/ws/eBayISAPI.dll?ViewItem&item=251447766737#ht_500wt_1414

अगर आप दिनांक 22-02-2014 को इलाहाबाद में ही हैं तो ये सेट विमोचन समारोह के दौरान खरीदकर रू 60/- का डाकखर्च बचा सकते हैं।

सोमवार, 27 जनवरी 2014

ग़ज़ल : ओढ़नी नोच डाली गई

बह्र : २१२ २१२ २१२
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जब उड़ी नोच डाली गई
ओढ़नी नोच डाली गई

एक भौंरे को हाँ कह दिया
पंखुड़ी नोच डाली गई

रीझ उठी नाचते मोर पे
मोरनी नोच डाली गई

खूब उड़ी आसमाँ में पतंग
जब कटी नोच डाली गई

देव मानव के चिर द्वंद्व में 
उर्वशी नोच डाली गई

शनिवार, 25 जनवरी 2014

अनुवाद : ‘रीडिंग जेल का गाथागीत’ नामक कविता का अंश - आस्कर वाइल्ड

आज पढ़िये आस्कर वाइल्ड की लम्बी कविता के एक अंश का छंदानुवाद
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उसे पड़ेगा मरना जिसने कत्ल कर दिया अपना प्यार
फिर भी सब ऐसा करते हैं, सब सुन लें यह बारंबार

कुछ आँखें तरेर कर, कुछ मीठे शब्दों से करें प्रहार
कायर करते हैं चुम्बन से और बहादुर ले तलवार

कुछ यौवन में कत्ल करें तो कुछ बूढ़े होकर लें जान
काम वासना के हाथों कुछ, कुछ लालच का कहना मान

जो दयालु हैं वो खंजर से प्रेम को करें मृत्यु प्रदान
वरना जल्दी ठंडे होकर मुर्दे होते बर्फ़ समान

कुछ का क्षण भर ही चलता है कुछ का लम्बा चलता प्यार
बेच रहे हैं कुछ तो कुछ ने मोल लिया जाकर बाजार

कुछ करते हैं बिना शिकन, कुछ रो रोकर करते हैं वार
सब करते हैं प्रेम कत्ल पर मौत न आती सबके द्वार
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The man had killed the thing he loved
And so he had to die.

Yet each man kills the thing he loves
By each let this be heard,
Some do it with a bitter look,
Some with a flattering word,
The coward does it with a kiss,
The brave man with a sword!

Some kill their love when they are young,
And some when they are old;
Some strangle with the hands of Lust,
Some with the hands of Gold:
The kindest use a knife, because
The dead so soon grow cold.

Some love too little, some too long,
Some sell, and others buy;
Some do the deed with many tears,
And some without a sigh:
For each man kills the thing he loves,
Yet each man does not die.

शुक्रवार, 17 जनवरी 2014

ग़ज़ल : आँखों में जो न उतरे वो दिल तलक न पहुँचे

बह्र : २२१ २१२२ २२१ २१२२ 
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रस्ते में जिस्म आया मंजिल तलक न पहुँचे
आँखों में जो न उतरे वो दिल तलक न पहुँचे

मंजिल मिली जिन्हें भी मँझधार में, उन्हीं पर
कसता जहान ताना, साहिल तलक न पहुँचे

जो पिस गये वो चमके हाथों की बन के मेंहदी
यूँ तो मिटेंगे वे भी जो सिल तलक न पहुँचे

मैं चाहता हूँ उसकी नज़रों से कत्ल होना
पर बात ये जरा सी कातिल तलक न पहुँचे

घटता है आज गर तो कल बढ़ भी जायेगा, पर
जानम ये प्यार अपना बस निल तलक न पहुँचे

गुरुवार, 2 जनवरी 2014

ग़ज़ल : इश्क जबसे वो करने लगे

बह्र : २१२ २१२ २१२
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इश्क जबसे वो करने लगे
रोज़ घंटों सँवरने लगे

गाल पे लाल बत्ती हुई
और लम्हे ठहरने लगे

दिल की सड़कों पे बारिश हुई
जख़्म फिर से उभरने लगे

प्यार आखिर हमें भी हुआ
और हम भी सुधरने लगे

इश्क रब है ये जाना तो हम
प्यार हर शै से करने लगे

कर्म अच्छे किये हैं तो क्यूँ
भूत से आप डरने लगे

रविवार, 8 दिसंबर 2013

ग़ज़ल : तेज धुन झूठ की वो बजाने लगा

बह्र : 212 212 212 212
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तेज धुन झूठ की वो बजाने लगा
ताल पर उसकी सबको नचाने लगा

उसके चेहरे से नीयत न भाँपे कोई
इसलिये मूँछ दाढ़ी बढ़ाने लगा

सबसे कहकर मेरा धर्म खतरे में है
शेष धर्मों को भू से मिटाने लगा

वोट भूखे वतन का मिले इसलिए
गोल पत्थर को आलू बताने लगा

सुन चमत्कार को ही मिले याँ नमन
आँकड़ों से वो जादू दिखाने लगा