मंगलवार, 24 अगस्त 2010

कविता

सड़क पर वाहनों की खिड़की के बाहर,
मेरे साथ साथ चलती है,
कविता;

रेलगाड़ी की खिड़की के बाहर,
हरे भरे खेतों के ऊपर,
मेरे साथ भागती है,
कविता;

बोरियत भरी मीटिंगों में,
मेरे मन में गूँजती रहती है,
कविता;

अकेले में अक्सर,
मुझसे बातें करती है,
कविता;

मेरी आत्मा में,
धीरे धीरे घुल रही है,
कविता;

अब मुझे कोई चिन्ता नहीं,
धर्म-अधर्म,
पाप-पूण्य,
स्वर्ग-नर्क की,
क्योंकि मैं कहीं भी जाऊँ,
हमेशा मेरे साथ रहेगी,
कविता।

3 टिप्‍पणियां:

  1. संपूर्ण कवितामय!!

    बहुत बढ़िया.

    उत्तर देंहटाएं
  2. अब मुझे कोई चिन्ता नहीं,
    धर्म-अधर्म,
    पाप-पूण्य,
    स्वर्ग-नर्क की,
    क्योंकि मैं कहीं भी जाऊँ,
    हमेशा मेरे साथ रहेगी,
    कविता।

    सुंदर अभिव्‍यक्ति .. रक्षाबंधन की बधाई और शुभकामनाएं !!

    उत्तर देंहटाएं
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