शुक्रवार, 10 जून 2011

कविता : नाभिक

कैसा रिश्ता है ये
क्यूँ जबरन बाँध रक्खा है
इन नन्हें नन्हें पाईऑनों ने
मुझे तुमसे

तुम न्यूट्रॉन, मैं प्रोटॉन
हमारे बीच कोई आकर्षण नहीं था
मगर हमें जबरन इतने करीब लाया गया
कि हम एक दूसरे से बँध गए
इन नन्हें नन्हें पाईऑनों के कारण

बेचारा इलेक्ट्रॉन
आज भी चक्कर लगा रहा है
हम दोनों के चारों तरफ़
मेरे प्रेमाकर्षण में बँधा

कभी कभी मैं सोचता हूँ
चला जाऊँ सब कुछ छोड़कर
इस नाभिक को तोड़कर
और गले लगा लूँ इलेक्ट्रॉन को
फिर सोचता हूँ
कि मैं और इलेक्ट्रॉन तो एक दूसरे को सोखकर
नष्ट हो जाएँगें
मगर तुम और पाइऑन अकेले रह जाओगे
नष्ट हो जाएगा नाभिक
और नाभिकों से बनी यह सृष्टि

मगर क्यूँ है यह सृष्टि ऐसी
क्यूँ पैदा करता है आकर्षण
ईश्वर उनके बीच
जो कभी मिल नहीं सकते
और अगर कभी मिल भी गए
तो दोनों ही नष्ट हो जाते हैं

1 टिप्पणी:

  1. विज्ञान के बिम्बों का सुंदर प्रयोग. शुभकामनायें.
    धन्यबाद मेरे ब्लॉग को ज्वाइन करने के लिए.

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