शनिवार, 13 अगस्त 2011

ग़ज़ल : तू गंगा है पावन रहे ये दुआ दूँ

निजी पाप की मैं स्वयं को सजा दूँ
तू गंगा है पावन रहे ये दुआ दूँ

न दिल रेत का है न तू हर्फ़ कोई
जिसे आँसुओं की लहर से मिटा दूँ

बहुत पूछती है ये तेरा पता, पर,
छुपाया जो खुद से, हवा को बता दूँ?

यही इन्तेहाँ थी मुहब्बत की जानम
तुम्हारे लिए ही तुम्हीं को दगा दूँ

बिखेरी है छत पर पर यही सोच बालू
मैं सहरा का इन बादलों को पता दूँ

5 टिप्‍पणियां:

  1. निजी पाप की मैं स्वयं को सजा दूँ
    तू गंगा है पावन रहे ये दुआ दूँ

    aapne bahut badi bat kaha di .....sabko isi tarah sochna chahiye....eye opener

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  2. यही इन्तेहाँ थी मुहब्बत की जानम
    तुम्हारे लिए ही तुम्हीं को दगा दूँ

    ....बहुत खूब ! ख़ूबसूरत गज़ल..

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  3. निजी पाप की मैं स्वयं को सजा दूँ
    तू गंगा है पावन रहे ये दुआ दूँ
    बहुत सुंदर अभिव्यक्ति , सार्थक पोस्ट , आभार

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  4. बहुत ही खुबसूरत ग़ज़ल....

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