सोमवार, 14 जनवरी 2013

ग़ज़ल : नाव ही नाखुदा हो गई

पेश है नन्हीं सी बहर की एक नन्हीं सी ग़ज़ल
बहर : २१२ २१२ २१२
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राहबरजब हवा हो गई
नाव ही नाखुदा हो गई

प्रेम का रोग मुझको लगा
और दारूदवा हो गई

जा गिरी गेसुओं में तेरे
बूँद फिर से घटा हो गई

चाय क्या मिल गई रात में
नींद हमसे खफ़ा हो गई

लड़ते लड़ते ये बुज़दिल नज़र
एक दिन सूरमा हो गई

जब सड़क पर बनी अल्पना
तो महज टोटका हो गई

माँ ने जादू का टीका जड़ा
बद्दुआ भी दुआ हो गई
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