मंगलवार, 2 जुलाई 2013

ग़ज़ल : जीतने तक उड़ान जिंदा रख

बहर : २१२२ १२१२ २२
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बाजुओं की थकान जिंदा रख
जीतने तक उड़ान जिंदा रख

आँधियाँ डर के लौट जाएँगीं
है जो खुद पे गुमान जिंदा रख

तेरा बचपन ही मर न जाय कहीं
वो पुराना मकान जिंदा रख

बेज़बानों से कुछ तो सीख मियाँ
तू भी अपनी ज़बान जिंदा रख

नोट चलता हो प्यार का भी जहाँ
एक ऐसी दुकान जिंदा रख

जान तुझमें ये डाल देंगे कभी
नाक, आँखें व कान जिंदा रख

4 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत खूब भाई शानदार ग़ज़ल है

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  2. बढ़िया-शुभकामनायें आदरणीय-

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  3. इस ग़ज़ल की प्रस्तुति और इसके भावपक्ष पर जितना कहूँ कम होगा भाईजी.
    एक-एक शेर महती गुरुत्व से भरा. इतना सान्द्र कि अम्लराज़ कुछ और पानी उड़ाना चाहे.

    इन दोइ अश’आर पर तो क़ुर्बान --
    तेरा बचपन ही मर न जाय कहीं
    वो पुराना मकान जिंदा रख

    बेज़बानों से कुछ तो सीख मियाँ
    तू भी अपनी ज़बान जिंदा रख

    वाह वाह वाह ... .
    जय हो..

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