शुक्रवार, 1 अप्रैल 2016

ग़ज़ल : जब जब तुम्हारे पाँव ने रस्ता बदल दिया

बह्र : २२१ २१२१ १२२१ २१२

जब जब तुम्हारे पाँव ने रस्ता बदल दिया
हमने तो दिल के शहर का नक्शा बदल दिया

इसकी रगों में बह रही नफ़रत ही बूँद बूँद
देखो किसी ने धर्म का बच्चा बदल दिया

अंतर गरीब अमीर का बढ़ने लगा है क्यूँ
किसने समाजवाद का ढाँचा बदल दिया

ठंडी लगे है धूप जलाती है चाँदनी
देखो हमारे प्यार ने क्या क्या बदल दिया

छींटे लहू के बस उन्हें इतना बदल सके
साहब ने जा के ओट में कपड़ा बदल दिया

8 टिप्‍पणियां:

  1. अंतर गरीब अमीर का बढ़ने लगा है क्यूँ
    किसने समाजवाद का ढाँचा बदल दिया ...
    वाह ... हर शेर लाजवाब है ... कुछ शेर तो गहरी चोट कर रहे हैं आज के हालात पर ...

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