रविवार, 27 जून 2021

नवगीत : बूढ़ा ट्रैक्टर

गड़गड़ाकर
खाँसता है
एक बूढ़ा ट्रैक्टर
डगडगाता
जा रहा है
ईंट ओवरलोड कर

सरसराती कार निकली
घरघराती बस
धड़धड़ाती बाइकों ने
गालियाँ दीं दस

कह रही है
साइकिल तक
हो गया बुड्ढा अमर

न्यूनतम का भी तिहाई
पा रहा वेतन
पर चढ़ी चर्बी कहें सब
ख़ूब इसके तन

थरथराकर
कांपता है
रुख हवा का देखकर

ठीक होता सब अगर तो
इस कदर खटता?
छाँव घर की छोड़कर ये
धूप में मरता?

स्वाभिमानी
खा न पाया
आज तक ये माँगकर

8 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत खूब ...
    बूढ़ा ट्रेक्टर ... बहुत कुछ न कहते हुवे भी कहता है ये नवगीत ...

    जवाब देंहटाएं
  2. बहुत ही सुंदर सृजन सर
    वैश्या पर आधारित हमारा नया अलेख एक बार जरूर देखें🙏

    जवाब देंहटाएं

जो मन में आ रहा है कह डालिए।