मंगलवार, 6 जुलाई 2010

पहाड़ों से लिपटी बर्फ

पहाड़ों से लिपटी बर्फ,
जब पिघल कर पानी बन जाती है,
तो मैदानों की ओर भागने लगती है,
और सागर में जाकर खो जाती है,
फिर धीरे धीरे जलती है,
जुदाई की आग में,
भाप बनकर उठती है,
बादल बनकर वापस दौड़ती है,
और भागकर लिपट जाती है,
पहाड़ों से,
दुबारा बर्फ बनकर।
और बेचारा पहाड़,
वो बार बार इस बर्फ को अपने गले से लेता है,
इसे माफ कर देता है, ये जानते हुए भी,
कि जैसे जैसे सूरज की चमकती धूप इसे मिलेगी,
यह पिघलेगी,
और फिर से मुझे छोड़कर चली जाएगी,
क्या यही प्रेम है,
जिससे प्रेम हो उसके सारे गुनाह माफ कर देना,
उसे बार बार फिर से अपना लेना, यह जानते हुए भी,
कि कुछ दिन बाद वह फिर छोड़ कर चला जायेगा।

सोमवार, 5 जुलाई 2010

बड़ा मुश्किल है

बड़ा मुश्किल है,
तुम पर कविता लिखना,
विज्ञान की प्रयोगशालाओं में,
कविता कहाँ बनती है?

परखनलियों में,
अम्लों में,
क्षारों में,
रासायनिक अभिक्रियाओं में,
कविता कहाँ बनती है?

तरह तरह की गैसों की दुर्गन्ध में,
भावनाहीन प्रयोगों में,
कविता कहाँ बनती है?

पर क्या करूँ मैं,
उन्हीं निर्जीव प्रयोगशालाओं में,
तो बिखरी पड़ी हैं तुम्हारी यादें,
तुम्हारे हाथ की छुवन,
जैसे अम्ल छू गया हो शरीर से,
आज भी सिहर उठता है मेरे हाथ का वह भाग,
तुम्हारी खनकती हँसी,
जैसे बीकर गिरकर टूट गया हो मेरे हाथ से,
तुम्हारी साँसों की आवृत्ति से,
मेरी साँसों का बढ़ता आयाम,
हमारे प्राणों का अनुनाद,
हमारी आँखों की क्रिया प्रतिक्रिया,
आँखों की अभिक्रियाओं से बढ़ता तापमान,
कहाँ से लाऊँ मैं उपमान,
वैज्ञानिक उपमानों से कहाँ बनती है कविता?

लगता था जैसे हमारे शरीरों के बीच का गुरुत्वाकर्षण,
किसी दूसरे ही नियम का पालन करता है,
कोई और ही सूत्र लगता है,
इस गुरुत्वाकर्षण की गणना करने हेतु,
जो शायद अभी खोजा ही नहीं गया है,
और शायद कभी खोजा जाएगा भी नहीं।

कुछ चीजें ना ही खोजी जाएँ तो अच्छा है,
कुछ कविताएँ ना ही लिखी जाएँ तो अच्छा है,
और कुछ कहानियाँ,
अधूरी ही रह जाएँ तो अच्छा है।

रविवार, 4 जुलाई 2010

ईश्वर

ईश्वर की शक्तियाँ;
अर्न्तधान होना,
रूप बदल लेना,
दुनिया को नष्ट कर देना,
मुर्दे को जीवित कर देना,
अंधे को आँखे दे देना,
लँगड़े को टाँगे लौटा देना,
बीमारों को ठीक कर देना,
आदि आदि,
इनमें से कुछ को,
विज्ञान मानव के हाथों में सौंप चुका है,
और कुछ को आने वाले समय मे सौंप देगा,
क्योंकि ये सारी शक्तियाँ,
द्रव्य और ऊर्जा की अवस्थाओं में परिवर्तन मात्र हैं,
और आने वाले कुछ सौ सालों में,
हम इनपर पूरी तरह विजय प्राप्त कर लेंगे।

क्या होगा तब?
मानव ईश्वर बन जायेगा?
या शायद ईश्वर मर जायेगा?
अब वक्त आ गया है,
कि हम ईश्वर की,
हजारों वर्ष पुरानी परिभाषा को बदल दें,
और एक नई परिभाषा लिखें,
जो शक्तियों के आधार पर ना बनाई गई हो,
जो डर के आधार पर न बनाई गई हो,
एक ऐसे ईश्वर की कल्पना करें,
जो अपनी खुशामद करने पर वरदान ना देता हो,
और अपनी बुराई करने पर दण्ड भी ना देता हो,
जो अपनी बनाई हुई सबसे महान कृति,
यानि मानव,
की बार बार सहायता करने के लिए,
धरती पर ना आता हो,
जो एक जाति विशेष,
को दान देने पर खुश न होता हो,

जिसे यकीन हो अपनी महानतम कृति पर,
कि ब्रह्मांण में फैली अनिश्चिता के बावजूद,
उसकी यह कृति अपना अस्तित्व बनाये रहेगी,
विकसित होती रहेगी,

ईश्वर को पुनः परिभाषित तो करना ही होगा,
अगर ईश्वर को जिन्दा रखना है,
तो हमें ऐसा करना ही होगा।

गुरुवार, 1 जुलाई 2010

बर्फ

बर्फ गिरती है तो कितना अच्छा लगता है,
उन लोगों को,
जो वातानुकूलित गाड़ियों से आते हैं,
और गर्म कमरों में घुस जाते हैं,
फिर निकलते हैं गर्म कपड़े पहनकर,
खेलने के लिए बर्फ के गोले बना बनाकर,
गर्म धूप में,

कोई ये नहीं जानता,
कि उस पर क्या बीतती है,
जो एक छोटी सी पत्थरों से बनी कोठरी में,
जिसकी छत लोहे की पुरानी चद्दरों से ढकी होती है,
गलती हुई बर्फ के कारण,
गिरते हुए तापमान में,
एक कम्बल के अन्दर,
रात भर ठण्ड से काँपता रहता है,
दिन भर के काम से थका होने के कारण,
नींद तो आती है,
पर अचानक कम्बल के एक तरफ से,
थोड़ा उठ जाने से,
लगने वाली ठण्ड की वजह से,
नींद खुल जाती है,
सारे अंगों को कम्बल से ढककर,
वह फिर सोने की कोशिश करने लगता है,
उस बर्फ को कोसते हुए,
जिसे सड़कों पर से हटाते हटाते,
दिन में उसके हाथ पाँव सुन्न हो गये थे,
ताकि वातानुकूलित गाड़ियों को आने जाने का,
रास्ता मिल सके।

बुधवार, 30 जून 2010

तू छोड़ गई मुझको बताते रहे खुद को

तू छोड़ गई मुझको बताते रहे खुद को,
कुछ इस तरह से उल्लू बनाते रहे खुद को।

मिट जाएगा नशा ये तेरा रगों से मेरी,
यह सोच के ताउम्र पिलाते रहे खुद को।

हट जाएगी खुशबू ये तेरी साँस से मेरी,
यह सोच के कीचड़ में गिराते रहे खुद को।

मिट जाएगी तस्वीर तेरी दिलोजान से,
यह सोच के ताउम्र मिटाते रहे खुद को।

हो जायेंगी अलग कभी तो रूहें हमारी,
यह सोच दोजखों में जलाते रहे खुद को।

जेहन से निकल जाएँगी रिसकर तेरी यादें,
यह सोच के हर नज्म में लाते रहे तुझको।

मंगलवार, 29 जून 2010

मेरा जिला

मेरा जिला मेरी रगों में बसा है,
मेरी यादें अक्सर रात के अँधेरों में,
घूमती हैं मेरे जिले की गलियों में,
वो स्कूल जिसमें मैंने अपने सात साल गुजारे,
आज भी वो मुझे खींच ले जाता है,
मेरे बचपन की शरारतों में,
वो कालेज जिसमें मैंने अपने सात साल गुजारे,
वो मुझे घसीट लेता है,
किशोरावस्था की मस्तियों में,
मेरे कितने सारे टुकड़े बिखरे पड़े हैं,
मेरे जिले के चप्पे चप्पे में,
और लोग कहते हैं,
इन सबको छोड़कर,
दिल्ली में मकान ले लो,
लखनऊ में मकान ले लो।

सोमवार, 28 जून 2010

मेरे विज्ञान! प्यारे विज्ञान!

मेरे विज्ञान! प्यारे विज्ञान!

ना हो जादू ना चमत्कार,
ना चालबाजियों कावतार,
ना परीकथाओं के नायक;
ना रिद्धि-सिद्धि के तुम दायक,
तुम हो केवल क्रमबद्ध ज्ञान;
मेरे विज्ञान! प्यारे विज्ञान!

तुम विकसित मानव संग हुए,
भौतिकी रसायन अंग हुए,
तुमसे आडंबर भंग हुए;
सब पाखंडी-जन दंग हुए,
तुमने सच का जब दिया ज्ञान;
मेरे विज्ञान! प्यारे विज्ञान!

अस्तित्व विहीन समय जब था,
ब्रह्मांड एक लघु कण भर था,
तब तुम बनकर क्वांटम गुरुत्व,
दिखलाते थे अपना प्रभुत्व,
है नमन तुम्हें हे चिर महान;
मेरे विज्ञान! प्यारे विज्ञान!

तुमसे ही नियमों को लेकर,
प्रभु ने अपनी ऊर्जा देकर,
था रचा महाविस्फोट वहाँ,
वरना जग होता नहीं यहाँ,
है सृष्टि तुम्हारा अमर गान;
मेरे विज्ञान! प्यारे विज्ञान!

चिर नियम अनिश्चितता का दे,
ब्रह्मांड सृजन के कारक हे,
यदि नहीं अनिश्चितता होती,
हर जगह अग्नि ही बस सोती,
तुम ही से है जग प्राणवान;
मेरे विज्ञान! प्यारे विज्ञान!

सब बँधे तुम्हारे नियमों से
ग्रह सूर्य और सारे तारे
आकाशगंग या कृष्ण-विवर
सब फिरते नियमों में बँधकर
कुछ ज्ञात हमें, कुछ हैं अजान
मेरे विज्ञान! प्यारे विज्ञान!

जब मानव सब कुछ जानेगा
वह यह सच भी पहचानेगा
तुममें ईश्वर, ईश्वर में तुम
इक बिन दूजा अपूर्ण हरदम
मिलकर दोनों बनते महान
मेरे विज्ञान! प्यारे विज्ञान!

रविवार, 27 जून 2010

अम्ल, क्षार और गीत

मेरे कुछ मनमीत,
अम्ल, क्षार और गीत।

एक खट्टा है,
दूसरा कसैला है,
तीसरे के सारे स्वाद हैं।

पहला गला देता है,
दूसरा जला देता है,
तीसरा सारे काम कर देता है।

पहले दोनों को मिलाने पर,
बनते हैं लवण और पानी,
अर्थात खारा पानी,
अर्थात आँसू,
और तीनों को मिलाने पर,
बन जाता हूँ मैं।

शनिवार, 26 जून 2010

जय गणेश - प्रथम सर्ग - उपसर्ग एक

’सज्जन’ इस संसार के, ग्यारह हैं आयाम;
तीन दिशाएँ, एक समय है, बाकी जानें राम।

सब रहस्य ब्रह्मांड के, अब तक हैं अनजान;
थोड़े से हमको पता, कहता है विज्ञान।

अब है ऐसा लग रहा, अपना यह संसार;
स्वयं समेटे आप में, बहुतेरे संसार।

जहाँ बसे हैं हम वहीं, हो सकते भगवान;
अन्तर बस आयाम का, अब होता है भान।

ऐसे इक संसार में, रहें शक्ति शिव संग;
है बिखेरती हिम जहाँ, भाँति-भाँति के रंग।

जहाँ शक्ति सशरीर हों, सूरज का क्या काम;
सबको ऊर्जा दे रहा, केवल उनका नाम।

कालचक्र है घूमता, प्रभु आज्ञा अनुसार;
जगमाता-जगपिता की, लीला अमर अपार।

करते हैं सब कार्य गण, लेकर प्रभु का नाम;
नंदी भृंगी से सदा, रक्षित है प्रभु धाम।

विजया, जया करें कदा, माता के संग वास;
प्रिय सखियों के संग उमा, किया करें परिहास।

हिमगिरि चारों ओर हैं, बीच बसा इक ताल;
मानसरोवर नाम है, ज्यों पयपूरित थाल।

कार्तिकेय हैं खेलते, मानसरोवर पास;
उन्हें देख सब मग्न हैं, मात-पिता, गण, दास।

सुन्दर छबि शिवपुत्र की, देती यह आभास;
बालरुप धर ज्यों मदन, करता हास-विलास।

सोच रहे थे जगपिता, देवों में भ्रम आज;
प्रथम पूज्य है कौन सुर, पूछे देव-समाज?

आदिदेव हूँ मैं मगर, स्वमुख स्वयं का नाम;
लूँगा तो ये लगेगा, अहंकार का काम।

कुछ तो करना पड़ेगा, बड़ी समस्या आज;
तभी सोच कुछ हँस पड़े, महादेव गणराज।

शुक्रवार, 25 जून 2010

बुरा जो ढूँढन मैं चला

मैं भी कबीर दास की तरह बुरा ढूँढने चला था,
मुझे तो एक से एक बुरे मिले,
हर जाति के, हर रंग के, हर भाषा के, हर धर्म के,
मुझमें भी कुछ कम बुराइयाँ नहीं मिलीं,
पर मैं सबसे बुरा हूँ,
मुझे ऐसा नहीं लगा,
आखिर क्या बदल गया कबीर के जमाने से,
आज के जमाने तक,
इंसान, युग या बुरे की परिभाषा?