बुधवार, 28 जुलाई 2010

धूल

धूल के कणों की एक अलग ही कहानी है

किसी जमाने में गर्व से सीना ताने
सिर ऊँचा उठाए खड़े
बड़े बड़े पहाड़ थे ये

प्रकृति को चुनौती देते हुए
प्रकृति की शक्तियों से लड़ते हुए
अपने आप को अजेय समझते थे

पर प्रकृति चुपचाप अपने काम में लगी रही
आहिस्ता आहिस्ता इन्हें काटती रही
तोड़ती रही
धीरे धीरे ये धूल के कण बन गए
और पाँवो की ठोकरों से इधर उधर बिखरने लगे

पर नए पहाड़ों ने इनसे कुछ नहीं सीखा
वो आज भी सीना ताने
प्रकृति को चुनौती देते
सर उठाए खड़े हैं

प्रकृति लगी हुई है
अपने काम में
आहिस्ता आहिस्ता

1 टिप्पणी:

  1. प्रकृति लगी हुई है,
    अपने काम में,
    आहिस्ता आहिस्ता

    -बहुत उम्दा!

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