रविवार, 8 अगस्त 2010

सपने

कुछ सपने दूर से कितने अच्छे लगते हैं,
भोले-भाले, प्यारे से, आदर्शवादी सपने;

पर अक्सर पूरा होते होते,
वो न तो भोले-भाले रह जाते हैं,
न प्यारे,
और आदर्शवाद का तो पूछिये ही मत;

ऐसे सपनों के टूट जाने पर उतना दुख नहीं होता,
जितना अंतरात्मा को,
अक्सर उनके पूरे होने पर होता है;

भगवान करे,
किसी के भी,
ऐसे सपने कभी पूरे ना हों,
कभी पूरे ना हों।

कोई टिप्पणी नहीं:

टिप्पणी पोस्ट करें

जो मन में आ रहा है कह डालिए।