रविवार, 2 अक्तूबर 2011

ग़ज़ल : एक ऐसा भी करीबी यार होना चाहिए

एक ऐसा भी करीबी यार होना चाहिए
आइना लेकर खड़ा हर बार होना चाहिए

घी अकेला क्या करेगा आग के बिन होम में
है ग़ज़ल तो भाव का शृंगार होना चाहिए

कह रहे हैं छंद तुलसी, सूर, मीरा के सदा
इश्क है तो इश्क का इजहार होना चाहिए

लाख हो खुशबू चमन में भूख मिट पाती नहीं
कुछ गुलों को भी यहाँ फलदार होना चाहिए

इस कदर बदबू सियासत से उठे लगता यही
हर सियासतदाँ यहाँ बीमार होना चाहिए

टूटटर अब खून के रिश्ते हमें सिखला रहे
प्रेम हर संबंध का आधार होना चाहिए

9 टिप्‍पणियां:

  1. अथ आमंत्रण आपको, आकर दें आशीष |
    अपनी प्रस्तुति पाइए, साथ और भी बीस ||
    सोमवार
    चर्चा-मंच 656
    http://charchamanch.blogspot.com/

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  2. शुभकामनाएं||
    बहुत ही बढ़िया ||
    बधाई |

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  3. "हर सियासतदाँ यहाँ बीमार होना चाहिए"
    बहुत-से लोग आप और हम जैसे हो गये तो एक-न-एक दिन तो प्रभु को अवश्य सुननी पड़ेगी हमारी ! :-)

    पहला शेर भी बहुत उम्दा है !

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  4. इस कदर बदबू सियासत से उठे लगता यही
    हर सियासतदाँ यहाँ बीमार होना चाहिए

    टूटटर अब खून के रिश्ते हमें सिखला रहे
    प्रेम हर संबंध का आधार होना चाहिए
    बेहतरीन अशआर सारे आपके ,हम हुए हैं आज आशिक आपके .

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  5. वाह.. बहुत खूब
    बहुत सुन्दर

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  6. वाह धर्मेन्द्र भाई,
    बेहतरीन अशआर कहे हैं आपने...
    शानदार गज़ल... सादर बधाई...

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