बुधवार, 22 फ़रवरी 2012

नवगीत : चंचल मृग सा

चंचल मृग सा
घर आँगन में दौड़ रहा हरदम
उत्सव का मौसम

घनुष हाथ में लेकर पल में राम सरीखा लगता
अगले ही पल लिए बाँसुरी बालकृष्ण सा दिखता
तन के रावण, कंस, पूतना
निकला सबका दम
मन मंदिर में गूँज रही अब
राधा की छमछम

दीपमालिका, उसकी हँसी अमावस में लगती है
थके हुए जीवन को नित नव संजीवन देती है
हर दिन मेरा हुआ दशहरा
खत्म हो गए गम
सब रातें हो गईं दिवाली
भागे सारे तम

अखिल सृष्टि में बालक-छवि से ज्यादा सुंदर क्या है
बच्चों में बसने को शायद प्रभु ने विश्व रचा है
करते इस मोहन छवि पर
सर्वस्व निछावर हम
नयनों में हो यह छवि तेरी
निकले जब भी दम

3 टिप्‍पणियां:

  1. भक्ति-भाव लख आपका, हिरदय भाव-विभोर ।

    प्रभु के दर्शन हो गए, शैशव संगत शोर ।।


    दिनेश की टिप्पणी - आपका लिंक
    http://dineshkidillagi.blogspot.in/

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  2. शुक्रवार के मंच पर, तव प्रस्तुति उत्कृष्ट ।

    सादर आमंत्रित करूँ, तनिक डालिए दृष्ट ।।

    charchamanch.blogspot.com

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  3. सलाम,आदरणीय ग्रेविटान का सृजनात्नक विस्तार,आपकी प्रज्ञा का विस्तार है.ख़ूबपढ़ा और सराहा.हर रंग-रस पाया.मुरीद हुं,शब्दश:
    प्रणाम.

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जो मन में आ रहा है कह डालिए।