बुधवार, 29 अगस्त 2012

ग़ज़ल : हाल-ए-दिल उससे कह पाना सब के बस की बात नहीं


गहराई से वापस आना सबके बस की बात नहीं
सागर तल से मोती लाना सबके बस की बात नहीं

कुछ तो है हम में जो मरते दम तक साथ निभाते हैं
हर दिन रूठा यार मनाना सबके बस की बात नहीं

जादू है उसकी बातों में वरना खुदा कसम मुझसे
अपनी बातें यूँ मनवाना सबके बस की बात नहीं

कुछ बातें, कुछ यादें, कुछ पागल लम्हे ही हैं वरना
जीवन भर मुझको तड़पाना सबके बस की बात नहीं

आशिक ताक रहे दिल अपना लेकर आँखों में लेकिन
हाल-ए-दिल उससे कह पाना सब के बस की बात नहीं

3 टिप्‍पणियां:

  1. धर्मेन्द्र जी, अब इतनी बेहतरीन ग़ज़ल की कितनी तारीफ करें। धन्योस्मि! - घनश्याम

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