नफ़रत का तम
नहीं मिटेगा
दिया जलाने से
लेकिन हाँ
ये मिट सकता है
सूरज लाने से
एक अकेला
दीप जले तो
रात नहीं जाती
लाखों दीपों
की भी सीमित
होती है बाती
इन्हें बुझाने
आ जाती अब
हवा बहाने से
मन के भीतर
बैठे डर को
हमें भगाना होगा
झूठी बातों
के जंगल में
सच को पाना होगा
उग जाता है
अब भी मन में
प्रेम उगाने से
एक जगह है
सूखी रोटी
दूजी तरफ मलाई
भूखे मन में
कैसे उतरे
राजा की शहनाई
बचती नहीं
वृद्ध दीवारें
रंग चढ़ाने से
सूरज कोई
आसमान से
अपने आप न आए
हममें सबमें
जितना प्रकाश है
सारा बाहर जाए
सूरज बनता
किरण-किरण को
पुंज बनाने से
यकीनन ग्रेविटॉन जैसा ही होता है प्रेम का कण। तभी तो ये मोड़ देता है दिक्काल को / कम कर देता है समय की गति / इसे कैद करके नहीं रख पातीं / स्थान और समय की विमाएँ। ये रिसता रहता है एक दुनिया से दूसरी दुनिया में / ले जाता है आकर्षण उन स्थानों तक / जहाँ कवि की कल्पना भी नहीं पहुँच पाती। इसका प्रत्यक्ष प्रमाण अभी तक नहीं मिला / लेकिन ब्रह्मांड का कण कण इसे महसूस करता है।
सदस्यता लें
टिप्पणियाँ भेजें (Atom)
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें
जो मन में आ रहा है कह डालिए।