गुरुवार, 17 सितंबर 2026

नवगीत: नफ़रत का तम नहीं मिटेगा दिया जलाने से

नफ़रत का तम
नहीं मिटेगा
दिया जलाने से
लेकिन हाँ
ये मिट सकता है
सूरज लाने से

एक अकेला
दीप जले तो
रात नहीं जाती
लाखों दीपों
की भी सीमित
होती है बाती

इन्हें बुझाने
आ जाती अब
हवा बहाने से

मन के भीतर
बैठे डर को
हमें भगाना होगा
झूठी बातों
के जंगल में
सच को पाना होगा

उग जाता है
अब भी मन में
प्रेम उगाने से

एक जगह है
सूखी रोटी
दूजी तरफ मलाई
भूखे मन में
कैसे उतरे
राजा की शहनाई

बचती नहीं
वृद्ध दीवारें
रंग चढ़ाने से

सूरज कोई
आसमान से
अपने आप न आए
हममें सबमें
जितना प्रकाश है
सारा बाहर जाए

सूरज बनता
किरण-किरण को
पुंज बनाने से

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