शुक्रवार, 2 जनवरी 2015

ग़ज़ल : दूर जाना चाहता तो ले के मेला चल

बह्र : २१२२ २१२२ २१२२ २

तेज़ चलना चाहता है तो अकेला चल
दूर जाना चाहता तो ले के मेला चल

खा के मीठा हर जगह से आ गया है तू
स्वस्थ रहना है तुझे तो खा करेला चल

सूर्य चढ़ने दे जरा, इस काँच के घर में
साँप ख़ुद मर जाएँगें, तू फेंक ढेला, चल

जिन्दगी अनजान राहों से गुजरती है
एक भटकेगा यकीनन हो दुकेला चल

चल रही आकाशगंगा चल रहे तारे
चल रहा जग तू भी अपना ले झमेला चल

8 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी लिखी रचना शनिवार 03 जनवरी 2015 को लिंक की जाएगी........... http://nayi-purani-halchal.blogspot.in आप भी आइएगा ....धन्यवाद!

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  2. बहुत बढ़िया ..
    नए साल की हार्दिक मंगलकामनाएं!

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  3. खा के मीठा हर जगह से आ गया है तू
    स्वस्थ रहना है तुझे तो खा करेला चल ..
    बहुत ही गज़ब का शेर ... लाजवाब गज़ल है धर्मेन्द्र जी ... सुभान अल्ला ... नव वर्ष मंगलमय हो ...

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जो मन में आ रहा है कह डालिए।