सोमवार, 12 जुलाई 2010

पत्थर

हम पत्थर नहीं पूजते,
हम पूजते हैं उसकी जिजीविषा को,
उसकी सहनशक्ति को,
उसके अदम्य साहस को,
उसकी इच्छाशक्ति को,
हर मौसम में जो एक सा बना रहता है,
न पिघलता है, न जलता है, न जमता है,
न जाने कितनी बार इसको तोड़ा गया है,
घिसा गया है,
पर इसके मुँह से आह तक नहीं निकली,
सब कुछ सहा है इसने,
इसको कितना भी कोस लो,
बुरा नहीं मानता,
पलटकर वार नहीं करता,
पत्थर ही धरती पर,
ईश्वर के सबसे ज्यादा गुण रखता है,
इसीलिए तो हम इसे पूजते हैं।

2 टिप्‍पणियां:

  1. मंगलवार 13 जुलाई को आपकी रचना .( बड़ा मुश्किल है ).. चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर ली गयी है आभार

    http://charchamanch.blogspot.com/

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