बुधवार, 14 जनवरी 2015

ग़ज़ल : मैं तुमसे ऊब न जाऊँ न बार बार मिलो

बह्र : १२१२ ११२२ १२१२ ११२

मैं तुमसे ऊब न जाऊँ न बार बार मिलो
बनी रहेगी मुहब्बत, कभी कभार मिलो

महज़ हो साथ टहलना तो आर पार मिलो
अगर हो डूब के मिलना तो बीच धार मिलो

मुझे भी खुद सा ही तुम बेकरार पाओगे
कभी जो शर्म-ओ-हया कर के तार तार मिलो

प्रकाश, गंध, छुवन, स्वप्न, दर्द, इश्क़, मिलन
मुझे मिलो तो सनम यूँ क्रमानुसार मिलो

दिमाग, हुस्न कभी साथ रह नहीं सकते
इसी यकीन पे बन के कड़ा प्रहार मिलो

2 टिप्‍पणियां:

  1. मुझे भी खुद सा ही तुम बेकरार पाओगे
    कभी जो शर्म-ओ-हया कर के तार तार मिलो
    गज़ब के नए काफिये ढूंढें है ... मज़ा आ गया हर शेर पर ... ढेरों दाद ...

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