सोमवार, 13 जून 2011

ग़ज़ल : रेत सी मजलूम की तकदीर है

रेत सी मजलूम की तकदीर है
हर लहर से मिट रही तदबीर है

सूर्य चढ़ते ही मिटा देता सदा
भाषणों की बर्फ़ सी तहरीर है

देश बेआवाज़ बँटता जा रहा
हर सियासतदाँ गज़ब शमशीर है

घाव दिल के वक्त भर देता मगर
धड़कनों के साथ बढ़ती पीर है

सींचती जबसे सियासत क्यारियाँ
फूल भी हाथों को देता चीर है

कब तलक फैशन बताओगे इसे
पाँव में जो लोक के जंजीर है

फ्रेम अच्छा है, बदल दो तंत्र पर,
हो गई अश्लील ये तस्वीर है

शुक्रवार, 10 जून 2011

कविता : नाभिक

कैसा रिश्ता है ये
क्यूँ जबरन बाँध रक्खा है
इन नन्हें नन्हें पाईऑनों ने
मुझे तुमसे

तुम न्यूट्रॉन, मैं प्रोटॉन
हमारे बीच कोई आकर्षण नहीं था
मगर हमें जबरन इतने करीब लाया गया
कि हम एक दूसरे से बँध गए
इन नन्हें नन्हें पाईऑनों के कारण

बेचारा इलेक्ट्रॉन
आज भी चक्कर लगा रहा है
हम दोनों के चारों तरफ़
मेरे प्रेमाकर्षण में बँधा

कभी कभी मैं सोचता हूँ
चला जाऊँ सब कुछ छोड़कर
इस नाभिक को तोड़कर
और गले लगा लूँ इलेक्ट्रॉन को
फिर सोचता हूँ
कि मैं और इलेक्ट्रॉन तो एक दूसरे को सोखकर
नष्ट हो जाएँगें
मगर तुम और पाइऑन अकेले रह जाओगे
नष्ट हो जाएगा नाभिक
और नाभिकों से बनी यह सृष्टि

मगर क्यूँ है यह सृष्टि ऐसी
क्यूँ पैदा करता है आकर्षण
ईश्वर उनके बीच
जो कभी मिल नहीं सकते
और अगर कभी मिल भी गए
तो दोनों ही नष्ट हो जाते हैं

रविवार, 5 जून 2011

कविता : विद्रोह

विरोध कायम रहे
इसके लिए जरूरी है
कि कायम रहे
अणुओं का कंपन

अणुओं का कंपन कायम रहे
इसके लिए जरूरी है
विद्रोह का तापमान

वरना ठंढा होते होते
हर पदार्थ
अंततः विरोध करना बंद कर देता है
और बन जाता है अतिचालक

उसके बाद
मनमर्जी से बहती है बिजली
बिना कोई नुकसान झेले
अनंत काल तक

शुक्रवार, 3 जून 2011

कविता: इंद्रियाँ और दिमाग़

इंद्रियाँ तो कठपुतलियाँ हैं
सबसे ऊपर बैठे दिमाग़ की
उसी के इशारों पर नाचती हैं
इंद्रियों को तो पता भी नहीं होता
कि वो आखिर कर क्या रही हैं
आवश्यकता से अधिक सुख सुविधाएँ
जिन्हें वो गलत तरीके से इकट्ठा कर रही हैं
उन्हें या तो निकम्मा बना देंगी
या रोगी
और अगर पकड़ी गईं
तो सारी सजा मिलेगी इंद्रियों को
बलि की बकरियाँ हैं इंद्रियाँ।

इंद्रियाँ करें भी तो क्या करें
आदिकाल से
नियम ही ऐसे बनते आये हैं
जिससे सारी सजा इंद्रियों को ही मिले,
हर देवता, हर महात्मा ने
हमेशा यही कहा है
कि इंद्रियों पर नियंत्रण रखो
दिमाग़ की तरफ़ तो
कभी भूल कर भी उँगली नहीं उठाई गई
कैसे उठाई जाती
उँगली भी तो आखिरकार
दिमाग़ के नियंत्रण में थी।

मगर कलियुग आने का
पुराने नियमों से विश्वास उठने का
एक फायदा तो हुआ है
अब यदा कदा कोई कोई उँगली
दिमाग़ की तरफ भी उठने लगी है,
ज्यादातर तो तोड़ दी जाती हैं
या जहर फैल जाएगा कहकर काट दी जाती हैं
मगर क्या करे दिमाग़
अनिश्चितता का सिद्धांत तो वो भी नहीं बदल सकता
कि उठने वाली हर उँगली तोड़ी नहीं जा सकती,
कोई न कोई उँगली बची रह ही जाएगी
तथा उस उँगली की सफलता को देखकर
उसके साथ और भी उँगलियाँ उठ खड़ी होंगी,
अन्ततः दिमाग को
उँगलियों की सम्मिलित शक्ति के सामने
सर झुकाना ही पड़ेगा
अपनी असीमित शक्ति का दुरुपयोग
रोकना ही पड़ेगा।

सोमवार, 30 मई 2011

कविता : बड़ी अजीब हैं तुम्हारी यादें

बड़ी अजीब हैं तुम्हारी यादें

दिमाग के थोड़े से आयतन में
छुपकर बैठी रहती हैं
तुम्हारी ठोस यादें

बस अकेलेपन की गर्मी मिलने की देर है
बढ़ने लगता है इनके अणुओं का आयाम
और ये द्रव बनकर बाहर निकलने लग जाती हैं

धीरे धीरे
जैसे जैसे
बढ़ती है अकेलेपन की गर्मी
ये गैस का रूप धारण कर लेती हैं
और भर जाती हैं दिमाग के पूरे आयतन में
अपना दबाव धीरे धीरे बढ़ाते हुए

एक दिन ऐसा भी आएगा
जब अकेलेपन की गर्मी इतनी बढ़ जाएगी
कि दिमाग की दीवारें
इन गैसों का दबाव सह नहीं पाएँगी
और ये गैसें
दिमाग की दीवारों को फाड़कर बाहर निकल जाएँगी

उस दिन तुम्हारी यादों को
मुक्ति मिल जाएगी
और मुझे शांति
मगर ये दुनिया कहेगी
कि मैं तुम्हारे प्यार में पागल हो गया।

सोमवार, 23 मई 2011

ग़ज़ल : सूरज उगते ही सारी यादें सो जाती हैं

चंदा तारे बन रातों में नभ को जाती हैं।
सूरज उगते ही सारी यादें सो जाती हैं।

आँखों में जब तक बूँदें तब तक इनका हिस्सा,
निकलें तो खारा पानी बनकर खो जाती हैं।

सागर की करतूतें बादल तट पर लिख जाते,
लहरें आकर पल भर में सबकुछ धो जाती हैं।

भिन्न उजाले में लगती हैं यूँ तो सब शक्लें,
किंतु अँधेरे में जाकर इक सी हो जाती हैं।

हवा सुगंधित हो जाये कितना भी पर ‘सज्जन’,
मीन सभी मरतीं जल से बाहर जो जाती हैं।

मंगलवार, 17 मई 2011

कविता : हम-तुम

हम-तुम
जैसे सरिया और कंक्रीट
दिन भर मैं दफ़्तर का तनाव झेलता हूँ
और तुम घर चलाने का दबाव

इस तरह हम झेलते हैं
जीवन का बोझ
साझा करके

किसी का बोझ कम नहीं है
न मेरा न तुम्हारा

झेल लेंगें हम
आँधी, बारिश, धूप, भूकंप, तूफ़ान
अगर यूँ ही बने रहेंगे
इक दूजे का सहारा

शनिवार, 14 मई 2011

ग़ज़ल: मेरी किस्मत में है तेरा प्यार नहीं

मेरी किस्मत में है तेरा प्यार नहीं
तेरी नफ़रत किंतु मुझे स्वीकार नहीं

दिल में बनकर चोट बसी जो तू मेरे
निकली फिर क्यूँ बन आँसू की धार नहीं

तुझसे होकर दूर मरा तो कबका मैं
रूह मगर क्यूँ जाने को तैयार नहीं

तुझको नफ़रत के बदले में नफ़रत दूँ
मान यकीं मैं इतना भी खुद्दार नहीं

जान मिरी हाजिर है तेरी खिदमत में
आता मुझ पर तेरा क्यूँ एतबार नहीं

मंगलवार, 10 मई 2011

प्यार की वैज्ञानिक व्याख्या

क्या?
प्यार की वैज्ञानिक व्याख्या चाहिए
तो सुनो
ब्रह्मांड का हर कण
तरंग जैसा भी व्यवहार करता है
और उसकी तरंग का कुछ अंश
भले ही वह नगण्य हो
ब्रह्मांड के कोने कोने तक फैला होता है

आकर्षण और कुछ नहीं
इन्हीं तरंगों का व्यतिकरण है
और जब कभी इन तरंगों की आवृत्तियाँ
एक जैसी हो जाती हैं
तो तन और मन के कम्पनों का आयाम
इतना बढ़ जाता है
कि आत्मा तक झंकृत हो उठती है
इस क्रिया को विज्ञान अनुनाद कहता हैं
और आम इंसान
प्यार

इसलिए अगर सच्चा प्यार चाहिए
तो शरीर नहीं
आवृत्ति मिलाने की कोशिश करो
मगर यह काम
जितना आसान दिखता है
उतना है नहीं
क्योंकि हो सकता है
कि जिससे तुम्हारी तरंगों की आवृत्ति मिले
वो पत्थर हो, पेड़ हो
अथवा
वो इस धरती पर हो ही नहीं

सोमवार, 9 मई 2011

ग़ज़ल : चिड़िया की जाँ लेने में इक दाना लगता है

चिड़िया की जाँ लेने में इक दाना लगता है
पालन कर के देखो एक जमाना लगता है ॥१॥

अंधों की सरकार बनी तो उनका राजा भी
आँखों वाला होकर सबको काना लगता है ॥२॥

जय जय के नारों ने अब तक कर्म किए ऐसे
हर जयकारा अब ईश्वर पर ताना लगता है ॥३॥

कुछ भी पूछो इक सा बतलाते सब नाम पता
तेरा कूचा मुझको पागलखाना लगता है ॥४॥

दूर बजें जो ढोल सभी को लगते हैं अच्छे
गाँवों का रोना दिल्ली को गाना लगता है ॥५॥

कल तक झोपड़ियों के दीप बुझाने का मुजरिम
सत्ता पाने पर अब वो परवाना लगता है ॥६॥

टूटेंगें विश्वास कली से मत पूछो कैसा
यौवन देवों को देकर मुरझाना लगता है ॥७॥

जाँच समितियों से करवाकर कुछ ना पाओगे
उसके घर में शाम सबेरे थाना लगता है॥८॥

रविवार, 8 मई 2011

मातृ-दिवस पर एक ग़ज़ल

आज मातृ-दिवस है, तो इस अवसर पर प्रस्तुत है एक ग़ज़ल

ठंढे बादल सी ममता, कब बरसात नहीं होती?
माँ का दिल ऐसी धरती, जिस पर रात नहीं होती ॥१॥

छप्पन भोगों से लगते, सूखी रोटी, तेल, नमक
दूजा अमृत भी धर दे, माँ सी बात नहीं होती ॥२॥

दानव से जब जब हारे, इंसाँ बन ईश्वर जन्मे
पा ली माँ की पाक दुआ, जिससे मात नहीं होती ॥३॥

हम इंसानों ने माँ को, कितना कष्ट दिया लेकिन
शैताँ कोशिश कर हारा, माँ पर घात नहीं होती ॥४॥

नाम पिता दे, शौहर दे, लेकिन फूल, दुआ, बारिश,
शीतल झोंका, छाया, माँ, इनकी जात नहीं होती ॥५॥

रविवार, 1 मई 2011

ग़ज़ल :पर खुशी से फड़फड़ाते आज सारे गिद्ध देखो

पर खुशी से फड़फड़ाते आज सारे गिद्ध देखो
फिर से उड़के दिल्ली जाते आज सारे गिद्ध देखो ॥१॥

रोज रोज खा रहे हैं नोच नोच भारती को
हड्डियों से घी बनाते आज सारे गिद्ध देखो ॥२॥

श्वान को सियासती गली के द्वार पे बिठाके
गर्म गोश्त मिल के खाते आज सारे गिद्ध देखो ॥३॥

आसमान से अकाल-बाढ़ देखते हैं और
लाशों का कफ़न चुराते आज सारे गिद्ध देखो ॥४॥

जल रहा चमन हवा में उड़ रहे हैं खाल, खून
इनकी दावतें उड़ाते आज सारे गिद्ध देखो ॥५॥

बुधवार, 27 अप्रैल 2011

कविता : लोकतंत्र का क्रिकेट

बड़ा अजीब खेल है लोकतंत्र का क्रिकेट
एक गेंद के पीछे ग्यारह सौ मिलियन लोग
उछल कर, गिर कर
झपट कर, लिपट कर
पकड़नी पड़ती है गेंद
कभी जमीन से, कभी आसमान से
जिसकी किस्मत अच्छी हो उसी को मिलती है गेंद

और बल्लेबाज
उसे तो मजा आता है क्षेत्र रक्षकों को छकाने में
अगर किसी तरह सबने मिलकर
बल्लेबाज को आउट कर भी दिया
तो फिर वैसा ही नया बल्लेबाज
उसका भी लक्ष्य वही
अगर पूरी टीम आउट हो गई
तो दूसरी टीम के बल्लेबाजों का भी लक्ष्य वही
सबसे ज्यादा पैसा है इस खेल में

इसीलिए तो क्रिकेट मेरे देश का धर्म है
जिसे देखना हर भारतवासी का कर्म है
क्यूँकि पता नहीं कब
किसी को ये उपाय सूझ जाए
कि कैसे हर खिलाड़ी के हिस्से में
कम से कम एक गेंद आए

रविवार, 24 अप्रैल 2011

कविता : चिकनी मिट्टी और रेत

चिकनी मिट्टी के नन्हें नन्हें कणों में
आपसी प्रेम और लगाव होता है
हर कण दूसरों को अपनी ओर
आकर्षित करता है
और इसी आकर्षण बल से
दूसरों से बँधा रहता है

रेत के कण आकार के अनुसार
चिकनी मिट्टी के कणों से बहुत बड़े होते हैं
उनमें बड़प्पन और अहंकार होता है
आपसी आकर्षण नहीं होता
उनमें केवल आपसी घर्षण होता है

चिकनी मिट्टी के कणों के बीच
आकर्षण के दम पर
बना हुआ बाँध
बड़ी बड़ी नदियों का प्रवाह रोक देता है,
चिकनी मिट्टी बारिश के पानी को रोककर
जमीन को नम और ऊपजाऊ बनाए रखती है;

रेत के कणों से बाँध नहीं बनाए जाते
ना ही रेतीली जमीन में कुछ उगता है
उसके कण अपने अपने घमंड में चूर
अलग थलग पड़े रह जाते हैं बस।

रविवार, 17 अप्रैल 2011

ग़ज़ल: काश यादों को करीने से लगा पाता मैं

काश यादों को करीने से लगा पाता मैं
तेरी यादों के सभी रैक हटा पाता मैं ॥१॥

एक लम्हा जिसे हम दोनों ने हर रोज जिया
काश उस लम्हे की तस्वीर बना पाता मैं ॥२॥

मेरे कानों में पढ़ा प्रेम का कलमा तुमने
काश अलफ़ाज़ वो सोने से मढ़ा पाता मैं ॥३॥

एक वो पन्ना जहाँ तुमने मैं हूँ गैर लिखा
काश उस पन्ने का हर लफ़्ज़ मिटा पाता मैं ॥४॥

दिल की मस्जिद में जिसे रोज पढ़ा करता हूँ
आयतें काश वो तुझको भी सुना पाता मैं ॥५॥

बुधवार, 13 अप्रैल 2011

ग़ज़ल : वो जो रुख़-ए-हवा समझते हैं

वो जो रुख़-ए-हवा समझते हैं
हम उन्हें धूल सा समझते हैं ॥१॥

चाँद रूठा ये कहके उसको हम
एक रोटी सदा समझते हैं ॥२॥

धूप भी तौल के बिकेगी अब
आप बाजार ना समझते हैं ॥३॥

तोड़ कर देख लें वो पत्थर से
जो हमें काँच का समझते हैं ॥४॥

जो बसें मंदिरों की नाली में
वो भी खुद को ख़ुदा समझते हैं ॥५॥

सोमवार, 11 अप्रैल 2011

नवगीत : समाचार हैं

समाचार हैं
अद्भुत,
जीवन के

अब बर्बादी
करे मुनादी
संसाधन सीमित
सड़ जाने दो
किंतु करेगा
बंदर ही वितरित
नियम
अनूठे हैं
मानव-वन के

प्रेम-रोग अब
लाइलाज
किंचित भी नहीं रहा
नई दवा ने
आगे बढ़कर
सबका दर्द सहा
रंग बदलते
पल पल
तन मन के

नौकर धन की
निज इच्छा से
अब है बुद्धि बनी
कर्म राम के
लेकिन लंका
देखो हुई धनी
बदल रहे
आदर्श
लड़कपन के

शनिवार, 9 अप्रैल 2011

कविता : कारखाने

देश की हर नदी को
धीरे धीरे गंदा कर दिया
कारखानों ने
इतना गंदा
कि उनका पानी पीने लायक नहीं बचा
फिर कारखाने के छोटे भाइयों ने
शुरू किया
पहाड़ों से पानी भरकर
उसे मैदानों में बेचने का सिलसिला
और जो पानी मुफ़्त मिला करता था
आज बोतलों में बिकता है।

हवाओं को भी धीरे धीरे
गंदा कर रहे हैं कारखाने
पता नहीं आने वाला वक्त
क्या दिन दिखाएगा?

गुरुवार, 31 मार्च 2011

ग़ज़ल : धँस कर दिल में विष फैलाता तेरा कँगना था

धँस कर दिल में विष फैलाता तेरा कँगना था
पत्थर ना हो जाता तो मेरा दिल सड़ना था ॥१॥

मदिरामय कर लूट लिया जिसने वो गैर नहीं
दिल में मेरे रहने वाला मेरा अपना था ॥२॥

कर आलिंगन मुझको जब रोई वो भावुक हो
जाने पल वो सच था या फिर कोई सपना था ॥३॥

बारी बारी साथ मेरा हर रहबर छोड़ गया
एक मुसाफिर था मैं मुझको फिर भी चलना था ॥४॥

जाने अब मैं जिंदा हूँ या गर्म-लहू मुर्दा
प्यार जहर में ना पाता तो मुझको मरना था ॥५॥

फर्क नहीं था जीतूँ या हारूँ मैं इस रण में
अपने दिल के टुकड़े से ही मुझको लड़ना था ॥६॥

रविवार, 20 मार्च 2011

होली की शुभकमनाओं के साथ प्रस्तुत है ये मस्ती भरी ग़ज़ल

आज पलकों पे आग पलने दो
ना बुझाओ चराग जलने दो

आग बुझती न सूर्य के दिल की
आयु दिन एक से हैं ढलने दो

नींद की बर्फ लहू में पैठी
रात की धूप में पिघलने दो

शर्म की छाँव, इश्क का पौधा
सूख जाएगा इसे फलने दो

थक गई है ये अकेले चलकर
आज साँसों पे साँस मलने दो

नीर सा मैं हूँ शर्करा सी तुम
थोड़ी जो है खटास चलने दो

शुक्रवार, 11 मार्च 2011

कविता: कार्बन

चार भुजाएँ होती हैं कार्बन परमाणु के पास
जिनमें चार इलेक्ट्रॉन होते हैं
जिसे वो किसी भी परमाणु के साथ
जिसको इलेक्ट्रॉन की जरूरत हो
हर समय साझा करने के लिए तैयार रहता है
मगर कार्बन किसी अन्य परमाणु को
अपने इलेक्ट्रॉन छीनने नहीं देता
केवल साझा करने देता है
यही वो गुण है
जिसके कारण
कार्बन से बने हुए विभिन्न यौगिकों के अणु
धरती पर जीवन का आधार बने हुए हैं;

कार्बन छोटा है मगर मजबूत है
दूसरों की मदद करता है
मगर अपनी रक्षा स्वयं करने में सक्षम है
मुट्ठी भर इलेक्ट्रान ही हैं उसके पास
मगर बड़े बड़े धनवान उससे साझा करने आते हैं
उसे किसी की सहानुभूति नहीं चाहिए
न ही किसी नेता के झूठे वादे चाहिए
वह स्वयं में परिपूर्ण है
दूसरे परमाणुओं की मदद
वह प्रसिद्ध होने के लिए नहीं करता
क्योंकि सबसे कीमती
सबसे प्रसिद्ध
“हीरा”
वह केवल अपने दम पर बनाता है।
पता नहीं इतने सारे कार्बन परमाणुओं से मिलकर
बनने के बावजूद
हम इंसानों में उसका कोई गुण क्यों नहीं आया?

बुधवार, 9 मार्च 2011

ग़ज़ल: हर अँधेरा ठगा नहीं करता

हर अँधेरा ठगा नहीं करता
हर उजाला वफा नहीं करता

देख बच्चा भी ले ग्रहण में तो
सूर्य उसपर दया नहीं करता

चाँद सूरज का मैल भी ना हो
फिर भी तम से दगा नहीं करता

बावफा है जो देश खाता है
बेवफा है जो क्या नहीं करता

गल रही कोढ़ से सियासत है
कोइ अब भी दवा नहीं करता

प्यार खींचे इसे समंदर का
नीर यूँ ही बहा नहीं करता

झूठ साबित हुई कहावत ये
श्वान को घी पचा नहीं करता

बुधवार, 2 मार्च 2011

महाशिवरात्रि के सुअवसर पर प्रस्तुत है “गणेश जन्म”

[१]
छंद : दोहा

है ग्यारह आयाम से, निर्मित यह संसार
सात मात्र अनुमान हैं, अभी ज्ञात हैं चार।

तीन दिशा आयाम हैं, चतुर्याम है काल;
चारों ने मिलकर बुना, स्थान-समय का जाल।

सात याम अब तक नहीं, खोज सका इंसान;
पर उनका अस्तित्व है, हमको है यह ज्ञान।

हैं रहस्य संसार के, बहुतेरे अनजान;
थोड़े से हमको पता, कहता है विज्ञान।

कहें समीकरणें सभी, होता है यह भान;
जहाँ बसे हैं हम वहीं, हो सकते भगवान।

यह भी संभव है सखे, हो अपना दिक्काल;
दिक्कालों के सिंधु में, तैर रही वनमाल।

ऐसे इक दिक्काल में, रहें शक्ति शिव संग;
है बिखेरती हिम जहाँ, भाँति-भाँति के रंग।

जहाँ शक्ति सशरीर हों, सूरज का क्या काम;
सबको ऊर्जा दे रहा, केवल उनका नाम।

कालचक्र है घूमता, प्रभु आज्ञा अनुसार;
जगमाता-जगपिता की, लीला अमर अपार।

करते हैं सब कार्य गण, लेकर प्रभु का नाम;
नंदी भृंगी से सदा, रक्षित है प्रभु धाम।

विजया जया किया करें, जब माता सँग वास;
प्रिय सखियों से तब उमा, करें हास परिहास।

हिमगिरि चारों ओर हैं, बीच बसा इक ताल;
मानसरोवर नाम है, ज्यों पयपूरित थाल।

कार्तिकेय हैं खेलते, मानसरोवर पास;
उन्हें देख सब मग्न हैं, मात-पिता, गण, दास।

सुन्दर छवि शिवपुत्र की, देती यह आभास;
बालरुप धर ज्यों मदन, करता हास-विलास।

सोच रहे थे जगपिता, देवों में भ्रम आज;
प्रथम पूज्य है कौन सुर, पूछे देव-समाज?

आदिदेव हूँ मैं मगर, स्वमुख स्वयं का नाम;
लूँगा तो ये लगेगा, अहंकार का काम।

कुछ तो करना पड़ेगा, बड़ी समस्या आज;
तभी सोच कुछ हँस पड़े, महादेव गणराज।

[२]
छंद : रोला

कालान्तर में जया और विजया ने आकर,
कहा उमा से--“सखी जरा सोचो तो आखिर;
ये सारे गण, नंदी, भृंगी शिव के चाकर,
शिव की ही आज्ञा का पालन करें यहाँ पर;
यद्यपि वे अपने ही हैं पर मन ना माने,
ऐसा कोई हो जो बस हमको पहचाने।”
माता बोलीं--“सच हो तुम दोनों का सपना,
फुर्सत में मैं कभी बना दूँगी गण अपना।”
आई गई हो गई यूँ ही घटना सारी,
पर लीला भोले की क्या जानें संसारी।
इक दिन माता स्नान कर रहीं थीं जब भीतर,
पहुँचे भोले भंडारी तब घर के बाहर;
नंदी खड़ा कर रहा था घर की रखवाली,
बोले प्रभो—“कहाँ है मेरी प्रिय घरवाली।”
नन्दी बोला—“स्नान कर रही हैं जगमाता।”
“हटो सामने से अब मैं हूँ अन्दर जाता।”
यह कहकर जब जगतपिता कुछ आगे आए,
नन्दी हटा पूर्ण श्रद्धा से शीश झुकाए;
आते देख प्रभो को, माँ को लज्जा आई,
तथा बात सखियों की तभी उन्हें याद आई;
उन्हें लगे वे वचन उस समय अति हितकारी,
निज गण का सुविचार लगा तब अति सुखकारी;
सोचा माँ ने एक गुणी बालक हो ऐसा,
कार्यकुशल, आज्ञा में तत्पर रहे हमेशा;
जो भय से या मोह-लोभ से विचलित ना हो,
देव, दैत्य, त्रिदेव से जिसे कुछ डर ना हो।

[3]
छंद : दुर्मिल

तब विचार कर माँ ने महाऊर्जा को तत्काल बुलाया,
और फिर उसे घनीभूत कर इक सुन्दर सा पिंड बनाया;
अपनी प्राण ऊर्जा का कुछ एक उसीमें अंश मिलाया,
तथा इस तरह चेतनता दे इक बालक संपूर्ण बनाया।
सुंदर दोषरहित अंगों का स्वामी, महाकाय वह था,
शोभायमान शुभलक्षण थे सम्पन्न पराक्रम बल से था;
देवी ने उसे अनेक वस्त्र, आभूषण औ’ आशीष दिया,
उसने देवी के सम्मुख आदर पूर्वक नत निज शीश किया।
बोलीं माता—“तुम अंश हमारे, पुत्र हमारे, हो प्यारे,
तुम प्रिय सबसे हो सुत मेरे, है नहीं दूसरा तुम सा रे;
तुम सभी गणों के हो स्वामी इसलिये नाम गणपति, गणेश,
तुमको है नहीं किसी का डर हों विधि या हरि या हों महेश।”
बोले गणेश तब--“हे माता मुझको क्यों जीवनदान दिया,
वह कौन असंभव कार्य जिसलिए है मेरा निर्माण किया।”
माता बोलीं--“इक कार्य बहुत छोटा सा तुमको है करना,
है घर का मुख्य द्वार तुमको हर पल हर क्षण रक्षित रखना;
मेरी आज्ञा के बिना कोइ भी भीतर न आने पाये,
वह हो कोई भी और कहीं से भी हठ करता वह आये।”
ऐसा कह माता ने इक छोटी सुदृढ़ छड़ी गणेश को दी,
फिर परमऊर्जा अपनी उसमें सारी की सारी भर दी;
हाथों में लेकर परमदण्ड आए गणेश दरवाजे पर,
माता होकर निश्चिन्त चलीं करने स्नान तब गृह भीतर।

[४]
छंद : तोमर

जटा बीच गंगधार,
करते लीला अपार,
बहुविधि नाना प्रकार;
आये प्रभु तभी द्वार।
खड़े थे गणेश वहीं,
बोले—“रुक जाओ यहीं,
माता हैं स्नान करें,
अभी आप धैर्य धरें;
देवि मिलना चाहेंगी,
तो स्वयं बुलायेंगी;
बिना उनकी आज्ञा के,
कोई भी जा न सके।”
यह सुन प्रभु तमक उठे,
रोम रोम भभक उठे,
बोले प्रभु—“अरे मूर्ख,
मारूँ मैं एक फूँक,
तो हिलती धरती है,
तेरी क्या हस्ती है;
जानता नहीं क्या तू,
मैं ही जगकर्ता हूँ,
मैं ही जगभर्ता हूँ,
मैं ही जगहर्ता हूँ,
विधि-हरि का सृष्टा हूँ
मैं त्रिकालदृष्टा हूँ,
पर तुझको तो मेरे,
सेवक ये बहुतेरे,
ही बेबस कर देंगे,
तव घमंड हर लेंगे।”
यह सुनकर गण बोले--
“क्रोधित हैं बम-भोले,
तुमको शिव-गण समान,
अब तक हम रहे मान,
वरना क्या तुम्हें ज्ञान,
कबका हर लेते प्रान,
इसी में भलाई अब,
थोड़ा सा जाओ दब,
रास्ते से हट जाओ,
मृत्यू से बच जाओ।”
बोले यह सुन गणेश,
“चाहे ये हों महेश
या हों जगसृष्टा ये,
या त्रिकालदृष्टा ये,
मैं आज्ञा पालक हूँ,
माता का बालक हूँ,
बिना मातृ आज्ञा के,
भीतर ये जा न सकें।”
यह सुनकर गण सारे,
बोले—“प्रभु हम हारे,
समझा-समझा इसको,
ये सुनता ना हमको,
जिद्दी यह लड़का है,
बुद्धी से कड़का है।”
गणों से ऐसा सुनकर,
बोले तब शिव शंकर,
“महारथी हो तुम सब,
इसकी क्यों सुनते अब,
मुझे कथा मत सुनाओ,
इसे द्वार से हटाओ।”

[५]
छंद : रोला

भोले भण्डारी के मुख से ऐसा सुनकर,
सारे आए अस्त्र शस्त्र हाथों में लेकर।
सबसे पहले नन्दी ने निज बल अजमाया,
महाऊर्जा ने झटका दे दूर हटाया;
एक बार जो गिरा दुबारा उठ ना पाया,
देख दशा नन्दी की सब का जी घबराया।
किन्तु क्रोध भोले का तभी ध्यान में आया,
सबने एक साथ मिलकर भुजबल दिखलाया;
पर अपार है भोले-भंडारी की माया,
महाऊर्जा ने वह झटका पुनः लगाया;
सबके सब गिर गये पलों में मूर्च्छित होकर,
दूर खड़े बस मुसकाते थे भोले-शंकर;
सोचा प्रभु ने कर दें गर्व चूर देवों का,
फूल गये सब कर सेवन पूजा-मेवों का।
इन्द्र देव को तब प्रभु ने तत्काल बुलाया,
अग्नि, पवन, दिनकर को भी वह सँग सँग लाया;
अग्नि देव सबसे पहले थे आगे आए,
आकर गौरीसुत पर सारे बल अजमाए;
अग्नि क्या करे जहाँ स्वयं हो महाऊर्जा,
पवन देव डर गये देख वह परमऊर्जा;
दिनकर जाकर छुपे पहाड़ों के पीछे फिर,
वरुण देव क्या करते हारे वे भी आखिर;
इन्द्र देव का वज्र पिघलकर मिला धरा में,
तथा मदन थे काँप रहे ज्यों वृद्ध जरा में;
आये तब विधि, हरि शस्त्रों से सज्जित होकर,
चक्र सुदर्शन लौटा ले शिवसुत के चक्कर;
सारे अस्त्र शस्त्र थे लौटे निष्फल होकर,
विधि, हरि देख रहे थे यही अचम्भित होकर।
इन सबका कर गर्व चूर शिव आगे आए,
शस्त्र उन्होंने भाँति भाँति के तब अजमाए;
अस्त्र शस्त्र गिर गए सभी जब निष्फल होकर,
तब जाकर थे क्रुद्ध हुए प्रभु भोले शंकर;
नेत्र तीसरा तभी उन्होंने अपना खोला,
निकला आदि ऊर्जा का उससे एक शोला;
महाऊर्जा हटी राह से शीश झुकाए,
मगर खड़े थे गौरीसुत निज शीश उठाये।
आदि ऊर्जा भस्म कर गई मस्तक उनका,
तड़प उठा होकर विहीन सर से धड़ उनका।

[६]

यह खबर गई माता का कोमल हृदय चीर,
दिल का लोहू टपका तब बनकर नयन नीर।
जब देखा माँ ने निज सुत का विच्छेदित तन,
तब बिलख बिलख कर रोया उनका कोमल मन।
ज्यों गंगाजल से निकल पड़ी हो महाअगन,
त्यों उनके मुख से थे निकले तब यही वचन।

XXX XXX XXX XXX

छंद : गीत

देवों दैत्यों का फर्क मिट गया आज!

एक नन्हे पौधे को कुचला,
इक कलिका को तुमने मसला,
तुमने बालक की हत्या की,
तुम महापाप के हो भागी,
आई ना तुमको सुरों जरा भी लाज!
देवों दैत्यों का फर्क मिट गया आज!

मानव बालक जिद करते हैं,
तो मानव पूरी करते हैं,
जिद अगर मानने योग्य नहीं,
तो समझाते हैं उसे सभी,
बहला फुसला सब करते अपना काज!
देवों दैत्यों का फर्क मिट गया आज!

तुम मानव से कुछ शिक्षा लो,
मत केवल पूजा-भिक्षा लो,
तुम मानव से भी निम्न आज,
तिस पर किंचित भी नहीं लाज,
तुम सबने पहना दानवता का ताज!
देवों दैत्यों का फर्क मिट गया आज!

मेरे बालक की क्या गलती,
यह तो मेरी ही आज्ञा थी,
निर्भय मेरा वह लालन था,
बस करता आज्ञा पालन था,
है मुझको अपने वीर पुत्र पर नाज!
देवों दैत्यों का फर्क मिट गया आज!

[७]
छंद : रोला

दिल का दर्द बहा नेत्रों से जैसे जैसे,
क्रोध उतरता आया उनमें वैसे वैसे।
सोचा माँ ने हुआ आज अपमान बड़ा है,
अहंकार नर का ही ये सशरीर खड़ा है;
नारीक्रोध आज इनको दिखलाना होगा,
इज्जत नारी की करना सिखलाना होगा;
क्रोध बढ़ा जगमाता का फिर जैसे जैसे,
काली रूप उभरता आया वैसे वैसे।
रूप महाकाली का क्या लिक्खूँ कैसा था,
धारण किया शरीर प्रलय ने कुछ ऐसा था;
उसे देख भयभीत हो गये शिवगण सारे,
दौड़े, भागे, छिपे सभी जा जा बेचारे;
काली करने लगीं द्रव्य-ऊर्जा रूपान्तर,
जलने लगीं दिशाएँ, सुलगे धरती अंबर;
लगे चीखने गण, काँपे देवों के अंतर,
निकट सृष्टि का अंत देखकर भोले शंकर;
बोले, “देवों! रुष्ट हो गईं हैं जगमाता,
माँ बेटे का होता है कुछ ऐसा नाता;
बेटे का अरि होता है माता का दुश्मन,
इसीलिए अब उमा-शत्रु से हैं हम सब जन;
महासमस्या है जल्दी हल करना होगा,
गौरीसुत को फिर से चंचल करना होगा;
भस्म कर चुकी हो जिसको खुद आदि ऊर्जा,
उसको फिर साकार नहीं कर सकता दूजा;
कामदेव को भस्म किया था इसने सारा,
बना अनंग घूमता तबसे वह बेचारा;
जाओ, दौड़ो, खोजो समय बहुत ही कम है,
ढूँढो कोई जिसमें गणपति सम दम-खम है;
उसका सिर लेकर आओ अतिशीघ्र तुम सभी,
सृष्टि बचेगी और बचोगे तुम सब तब ही।”
दौड़े सभी देवता औ’ शिवगण तब ऐसे,
देख काल को भागें सब नश्वर नर जैसे;
दिखा एक गज महाकाय तब अतिबलशाली,
काटा शीश, तोड़ता ज्यों कलिका को माली;
लेकर आये, धन्वन्तरि तैयार खड़े थे,
जोड़ा सिर को धड़ से, वे होशियार बड़े थे;
भोले शंकर तब मुस्काकर आगे आये,
थोड़ी प्राण ऊर्जा अपनी सँग ले लाये;
वही ऊर्जा अपनी जब गणपति में डाली,
हुआ पुत्र सम्पूर्ण सोच मुस्का दीं काली;
गणपति उठे तेज शिव औ’ शक्ती का लेकर,
उन्हें साथ ले आगे आए भोले शंकर।
बोले काली से, “देवी अब शांति धरो तुम,
अखिल सृष्टि का ऐसे मत विध्वंस करो तुम;
पुत्र तुम्हारा है जीवित, अजेय, बलशाली,
अब तो बनो शिवा हे महाकाल की काली;
अनजाने में तुम्हरा जो अपमान किया है,
आज उसी की खातिर यह वरदान दिया है;
नारी नाम सदा नर से पहले आएगा,
भोले शंकर गौरीशंकर कहलाएगा;
नारी की आहुति बिन यज्ञ अपूर्ण रहेंगे,
मुझे आज से गौरीपति सब लोग कहेंगे;
बिन प्रयास वह पुरुष हृदय पर राज करेगी,
अखिल सृष्टि इक दिन नारी पर नाज करेगी;
नारी का अपमान करेगा जो कोई भी,
होगा नष्ट समूल देव हो या कोई भी;
जिस भी घर में नारी का सम्मान रहेगा,
उस घर का निज देश जाति में मान रहेगा;
इसीलिए हे गौरी अब निज क्रोध तजो तुम,
भजो भजो, हे देवो! जय जय उमा भजो तुम।”
लगे देव सब कहने जय जय खप्परवाली,
करो कृपा हम सबपर महाकाल की काली।
हे अम्बे, जगदम्बे, हे जगमाता जय हो,
हे परमेश्वरि, शिवे, आदिशक्ती जय जय हो;
शांत करो निज क्रोध दया तुम दिखलाओ माँ,
करो सृष्टि पर कृपा पुत्र को दुलराओ माँ।
आगे बढ़े गणेश और फिर बोले माता,
हो जाओ अब शान्त दयामयि! हे जगमाता!
सुने पुत्र के वचन मधुर तो माता पिघलीं,
काली रूप तजा औ’ बनकर गौरी निकलीं;
बोलीं जगमाता तब सब से, “हे बड़भागी,
हुए आज तुम सब बालक-हत्या के भागी;
इसका प्रायश्चित तुम सबको करना होगा,
देवों की महिमा को जीवित रखना होगा।”
सभी देवता कर प्रणाम माँ को बोले तब,
हमसे पहले गणपति की पूजा होगी अब;
यज्ञ भाग सबसे पहले गणपति का होगा,
गणपति की पूजा बिन सबकुछ निष्फल होगा;
हैं गणेश अब से ही सर्वाध्यक्ष सुरों के,
पूज्य आज से देव, नरों, अक्षों, असुरों के।
सब बच्चों में प्रभो स्वयं अब वास करेंगे,
बालक सेवा करने से दुख नाश करेंगे;
बालक की मुस्कान हमें नित ऊर्जा देगी,
बालक दुख में दरिद्रता ही वास करेगी;
पूजा सबसे बड़ी, हँसी नन्हें बालक की,
बाकी सारी पूजा इसके बाद है आती।
नारी का सम्मान सिखा देवों को माता,
हुईं प्रसन्न देख बालक-ईश्वर का नाता।

छंद : दोहा

गौरीसुत का तेजमय, सुन्दर मुख अवलोक।
वर दे निज सामर्थ्य के, गए सभी निज लोक॥

नारी का सम्मान औ’ हर बालक को प्यार।
करता जो भी जन, सदा, पाता खुशी अपार॥

हर्षित थे भोले बहुत, पूर्ण हुआ यह काम।
प्रथम पूज्य के रूप में, स्वीकृत गणपति नाम॥

शनिवार, 26 फ़रवरी 2011

ग़ज़ल: एक आँसू आँख से बाहर छलकता रोज ही

एक आँसू आँख से बाहर छलकता रोज ही
जख़्म यूँ तो है पुराना पर कसकता रोज ही।

थी मिली मुझसे गले तू पहली-पहली बार जब
वक्त की बदली में वो लम्हा चमकता रोज ही।

कोशिशें करता हूँ सारा दिन तुझे भूलूँ मगर
चूम कर तस्वीर तेरी मैं सिसकता रोज ही।

इक नई मुश्किल मुझे मिल जाती है हर मोड़ पर,
क्या ख़ुदा की आँख में मैं हूँ खटकता रोज ही।

लिख गया तकदीर में जो रोज बिखरूँ टूट कर
आखिरी पल मैं उसी को हूँ पटकता रोज ही।

बुधवार, 23 फ़रवरी 2011

ग़ज़ल: लुटके मस्जिद से हम नहीं आते

लुटके मस्जिद से हम नहीं आते
मयकदे में कदम नहीं आते

कोई बच्चा कहीं कटा होगा
गोश्त यूँ ही नरम नहीं आते

आग दिल में नहीं लगी होती
अश्क इतने गरम नहीं आते

भूख से फिर कोई मरा होगा
यूँ ही जलसों में रम नहीं आते

प्रेम में गर यकीं हमें होता
इस जहाँ में धरम नहीं आते

कोई अपना ही बेवफ़ा होगा
यूँ ही आँगन में बम नहीं आते

सोमवार, 31 जनवरी 2011

ग़ज़ल : कबूतर छल रहा है

कबूतर छल रहा है
बवंडर पल रहा है ।१।

वही है शोर करता
जो सूखा नल रहा है ।२।

मैं लाया आइना क्यूँ
ये उसको खल रहा है ।३।

दिया ही तो जलाया
महल क्यूँ गल रहा है ।४।

छुवन वो प्रेम की भी
अभी तक मल रहा है ।५।

डरा बच्चों को ही अब
बड़ों का बल रहा है ।६।

वो मेरे स्नेह से ही
मेरा दिल तल रहा है ।७।

छुआ जिसको खुदा ने
वही घर जल रहा है ।८।

दहाड़े जा रहा वो
जो गीदड़ कल रहा है ।९।

जिसे सींचा लहू से
वही खा फल रहा है ।१०।

उगा तो जल चढ़ाया
अगिन दो ढल रहा है ।११।

सोमवार, 24 जनवरी 2011

गणतंत्र दिवस के अवसर पर एक ग़ज़ल

देश के कण कण से औ’ जन जन से मुझको प्यार है
जिसके दिल से ये सदा आए न वो गद्दार है ।१।

अंग अपना ही कभी था रंजिशें जिससे हुईं
लड़ रहे हम युद्ध जिसकी जीत में भी हार है ।२।

इश्क ने तेरे मुझे ये क्या बनाकर रख दिया
लौट कर आता उसी चौखट जहाँ दुत्कार है ।३।

है अगर हीरा तुम्हारे पास तो कोशिश करो
पत्थरों से काँच को यूँ छाँटना बेकार है ।४।

हों हवाओं में मनोहर खुशबुएँ कितनी भी पर
नीर से ही मीन की है जिंदगी, संसार है ।५।

तैरना तू सीख ले पानी ने लाशों से कहा
अब भँवर की ओर जाती हर नदी की धार है ।६।

देश की मिट्टी थी खाई मैंने बचपन में कभी
इसलिए अब चाहतों की खून से तकरार है ।७।

मारने वाला पकड़ में आ न पाया तो कहा
इन गरीबों पर पड़ी भगवान की ये मार है ।८।

हम हुए इतने विषैले हों अमर इस चाह में
कल तलक था कोबरा जो अब हमारा यार है ।९।

न्याय कैसे देख पाए आँख पर पट्टी बँधी
एक पलड़े की तली में अब जियादा भार है ।१०।

शुक्रवार, 14 जनवरी 2011

कविता : गूलर का फूल

सैकड़ों किस्सों में आया
गूलर के फूल का नाम

गली गली चर्चा हुई
गूलर के फूल की

न जाने कितनों ने दुआ माँगी
अगले जन्म में गूलर का फूल हो जाने की

गूलर का फूल बेचारा
फल के अन्दर बन्द
खुली हवा में साँस लेने को तरसता रहा

कीड़ों ने उसमें अपना घर बना लिया
उसकी खुशबू
उसका पराग लूटते रहे

गूलर का फूल दुआ माँगता रहा
ईश्वर अगले जन्म में मुझे कुछ भी बना देना
बस गूलर का फूल मत बनाना।

मंगलवार, 11 जनवरी 2011

दस हाइकु

मंत्र-मानव
प्रगति कर बना
यंत्र-मानव

नया जमाना
कैसे जिए ईश्वर
वही पुराना

ढूँढे ना मिली
खो गई है कविता
शब्दों की गली

बात अजीब
सेवक हैं अमीर
लोग गरीब

फलों का भोग
भूखों मरे ईश्वर
खाएँ बंदर

क्या उत्तर दें
राम कृष्ण से बन
सीता राधा को

पहाड़ उठे
खाई की गर्दन पे
पाँव रखके

माँ का आँचल
है कष्टों की घूप में
नन्हा बादल

आँखें हैं झील
पलकें जमीं बर्फ
मछली सा मैं

हवा में आके
समझा मछली ने
पानी का मोल

रविवार, 2 जनवरी 2011

ग़ज़ल : ग़ज़ल पर ग़ज़ल क्या कहूँ मैं

बहर : फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन
बहरे मुतकारिब मुसद्दस सालिम

ग़ज़ल पर ग़ज़ल क्या कहूँ मैं
यही बेहतर चुप रहूँ मैं

तेरे रूप की धूप गोरी
तेरे गेसुओं से सहूँ मैं

न तेजाब है ना अगन तू
तुझे छूके फिर क्यूँ दहूँ मैं

न चिंता मुझे दोजखों की
जमीं पर ही जन्नत लहूँ मैं

जो दीवार बन तुझको रोकूँ
कसम मुझको फौरन ढहूँ मैं

तेरे प्यार की धार में ही
मरूँ या बचूँ पर बहूँ मैं

शनिवार, 1 जनवरी 2011

गीत : साल जाता है पुराना

काँपता सा वर्ष नूतन
आ रहा, पग डगमगाएँ
साल जाता है
पुराना सौंप कर घायल दुआएँ

आरती है अधमरी सी
रोज बम की चोट खाकर
मंदिरों के गर्भगृह में
छुप गए भगवान जाकर
काम ने निज पाश डाला
सब युवा बजरंगियों पर
साहसों को
जकड़ बैठीं वृद्ध मंगल कामनाएँ

है प्रगति बंदी विदेशी
बैंक के लॉकर में जाकर
रोज लूटें लाज घोटाले
गरीबी की यहाँ पर
न्याय सोया है समितियों
की सुनहली ओढ़ चादर
दमन के हैं
खेल निर्मम क्रांति हम कैसे जगाएँ

लपट लहराकर उठेगी
बंदिनी इस आग से जब
जलेंगे सब दनुज निर्मम
स्वर्ण लंका गलेगी तब
पर न जाने राम का वह
राज्य फिर से आएगा कब
जब कहेगा
समय आओ वर्ष नूतन मिल मनाएँ

सोमवार, 27 दिसंबर 2010

नवगीत : प्रेम हो गया आज नमकीन

प्रेम हो गया आज नमकीन

खर्च सोडियम करता रहता है
अपना आवेश
पाकर उसको झटक रही क्लोरीन
खुशी से केश
लेनदेन का यह आकर्षण
हुआ बड़ा रंगीन

कभी किया करते थे कार्बन
ऑक्सीजन साझा
प्रेम हुआ करता था मीठा तब
गुड़ से ज्यादा
ढ़ाई आखर प्रेम मिट गया
शब्द बचे हैं तीन

दुनिया के ज्यादातर अणु साझे
से बनते हैं
लेन देन के बंधन पानी तक
से मिटते हैं
जिस बंधन पर सृष्टि टिकी वो
लौटेगा इक दिन

शनिवार, 18 दिसंबर 2010

ग़ज़ल : ख़ुमारी है मय की

ख़ुमारी है मय की गुलों की नज़ाकत
ख़ुदा की है ये दस्तकारी मुहब्बत ।१।

लगे कोयले सा खदानों में हीरा
बना देती है नीच नीचों की सोहबत ।२।

तुझे याद जब जब करे मन का सागर
सुनामी है उठती मचाती कयामत ।३।

लिखा दूसरों का जो पढ़ते हैं भाषण
वही लिख रहे हैं गरीबों की किस्मत ।४।

डकैती घोटाले क़तल तस्कारी सब
इन्हीं की बनी आज लॉकर सियासत ।५।

सँवारूँ मैं कैसे नहीं रूह दिखती
मुझे आइने से है इतनी शिकायत ।६।

न ही कौम पर दो न ही दो ख़ुदा पे
जो देनी ही है देश पर दो शहादत ।७।

करो चाहे जो भी करो पर लगन से
है ऐसे भी होती ख़ुदा की इबादत ।८।

नहीं हाथियों पर जो रक्खोगे अंकुश
चमन नष्ट होगा मरेगा महावत ।९।

न जाने वो थे बुत या थे अंधे बहरे
मरा न्याय जब भी भरी थी अदालत ।१०।

न समझे तु प्रेमी तो पागल समझ ले
है जलना शमाँ पे पतंगों की आदत ।११।

मैं जन्मों से बैठा तेरे दिल के बाहर
कभी तो करेगी तु मेरा भी स्वागत ।१२।

नहीं झूठ का मोल कौड़ी भी लेकिन
लगाता हमेशा यही सच की कीमत ।१३।

मिलेगी लुटेगी न जाने कहाँ कब
सदा से रही बेवफा ही ये दौलत ।१४।

नहीं चाहता मैं के तोड़ूँ सितारे
लिखूँ सच मुझे दे तु इतनी सी हिम्मत ।१५।

ग़ज़ल में तेरा हुस्न भर भी अगर दूँ
मैं लाऊँ कहाँ से ख़ुदा की नफ़ासत ।१६।

बरफ़ के बने लोग मिलने लगे तो
नहीं रह गई और उठने की हसरत ।१७।

शनिवार, 11 दिसंबर 2010

हवाई जहाज

हवाई जहाज को
दुनिया और ख़ासकर शहर
बड़े खूबसूरत नजर आते हैं
सपाट चमचमाती सड़कों से उड़ना
रुई के गोलों जैसे
सफेद बादलों के पार जाना
हर समय चमचमाते हुए
हवाई अड्डों पर उतरना या खड़े रहना
दरअसल
असली दुनिया क्या होती है
हवाई जहाज
ये जानता ही नहीं
वो अपना सारा जीवन
असली दुनिया से दूर
सपनों की चमकीली दुनिया में ही बिता देता है

हवाई जहाज भी क्या करे
उसका निर्माण किया ही गया है
सपनों की दुनिया में रहने के लिए
वो रिक्शे या साइकिल की तरह
गंदी गलियों और
टूटी सड़कों पर नहीं चल सकता
कीचड़ या कचरे की बदबू नहीं सहन कर सकता
शरीर पर जरा सी भी खरोंच लग जाय
तो सड़ने लगता है
विश्व का सबसे अच्छा ईंधन
सबसे ज्यादा मात्रा में इस्तेमाल करता है

हवाई जहाज
या उसके सपनों की दुनिया से
मुझे कोई ऐतराज नहीं
ऐतराज इस बात से है
कि हवाई जहाज के हाथ में ही
असली दुनिया की बागडोर है
वह उस जगह बैठकर
आम इंसानों के लिए नियम बनाता है
जहाँ से आम इंसान
या तो चींटी जैसा दिखता है
या दिखता ही नहीं
इसीलिए ज्यादातर नियम
केवल हवाई यात्रा करने वालों की
सुविधाओं का साधन बन कर रह जाते हैं
और आम इंसान
चींटियों की तरह
थोड़े से आटे के लिए ही
संघर्ष करता
जीता मरता
रह जाता है।

बुधवार, 8 दिसंबर 2010

ग़ज़ल : हराया है तुफ़ानों को

हराया है तुफ़ानों को मगर ये क्या तमाशा है
हवा करती है सरगोशी बदन ये कांप जाता है।

गरजती है बहुत फिर प्यार की बरसात करती है
ये मेरा और बदली का न जाने कैसा नाता है।

है सूरज रौशनी देता सभी ये जानते तो हैं
अगन दिल में बसी कितनी न कोई भाँप पाता है।

वो ताकत प्रेम में पिघला दे पत्थर लोग कहते हैं
पिघल जाता है जब पत्थर जमाना तिलमिलाता है।

कहाँ से नफ़रतें आके घुली हैं उन फ़िजाओं में
जहाँ पत्थर भी ईश्वर है जहाँ गइया भी माता है।

चला जाएगा खुशबू लूटकर हैं जानते सब गुल
न जाने कैसे फिर भँवरा कली को लूट पाता है।

न ही मंदिर न ही मस्जिद न गुरुद्वारे न गिरिजा में
दिलों में झाँकता है जो ख़ुदा को देख पाता है।

पतंगे यूँ तो दुनियाँ में हजारों रोज मरते हैं
शमाँ पर जान जो देता वही सच जान पाता है।

हैं हमने घर बनाए दूर देशों में बता फिर क्यूँ
मेरे दिल के सभी बैंकों में अब भी तेरा खाता है।

बने इंसान अणुओं के जिन्हें यह तक नहीं मालुम
क्यूँ ऐसे मूरखों के सामने तू सर झुकाता है।

है जिसका काला धन सारा जमा स्विस बैंक लॉकर में
वही इस देश में मज़लूम लोगों का विधाता है।

नहीं था तुझमें गर गूदा तो इस पानी में क्यूँ कूदा
मोहोब्बत ऐसा दरिया है जो डूबे पार जाता है।

कहेंगे लोग सब तुझसे के मेरी कब्र के भीतर
मेरी आवाज में कोई तेरे ही गीत गाता है।

दिवारें गिर रही हैं और छत की है बुरी हालत
शहीदों का ये मंदिर है यहाँ अब कौन आता है।

नहीं हूँ प्यार के काबिल तुम्हारे जानता हूँ मैं
मगर मुझसे कोई बेहतर नजर भी तो न आता है।

मैं तेरे प्यार का कंबल हमेशा साथ रखता हूँ
भरोसा क्या है मौसम का बदल इक पल में जाता है।

सोमवार, 29 नवंबर 2010

विज्ञान के विद्यार्थी का प्रेम गीत

एक बहुत पुरानी रचना है आप भी आनंद लीजिए

अवकलन समाकलन
फलन हो या चलन-कलन
हरेक ही समीकरन
के हल में तू ही आ मिली

घुली थी अम्ल क्षार में
विलायकों के जार में
हर इक लवण के सार में
तु ही सदा घुली मिली

घनत्व के महत्व में
गुरुत्व के प्रभुत्व में
हर एक मूल तत्व में
तु ही सदा बसी मिली

थीं ताप में थीं भाप में
थीं व्यास में थीं चाप में
हो तौल या कि माप में
सदा तु ही मुझे मिली

तुझे ही मैंने था पढ़ा
तेरे सहारे ही बढ़ा
हुँ आज भी वहीं खड़ा
जहाँ मुझे थी तू मिली

शुक्रवार, 26 नवंबर 2010

कल रात

कल रात दिल्ली की सड़कों पर
हुआ एक बलात्कार
आज रात भर
उन्हीं सड़कों पर
घूमती रही पुलिस,
दो चार दिन की बात है
फिर सब वैसे का वैसा हो जाएगा
इतिहास एक बार फिर
स्वयं को दोहराएगा

बुधवार, 24 नवंबर 2010

चश्मा

कुछ दिनों पहले उसके पास
दो सौ रूपए का चश्मा था
बार बार उसके हाथों से गिर जाता था
और वो बड़ी शान से सबसे कहता था
मेहनत की कमाई है
खरोंच तक नहीं आएगी।

आज वो चार हजार का चश्मा पहनता है
मगर वो चश्मा जरा सा भी
किसी चीज से छू जाता है
तो वह तुरंत उलट पलट कर
ये देखने लगता है
कि कहीं चश्मे में
कोई खरोंच तो नहीं आ गई।

शुक्रवार, 19 नवंबर 2010

इस मौसम में हरदम मेरा दिल जलता रहता है।

इस मौसम में हरदम मेरा दिल जलता रहता है।

पाँव तुम्हारा चूम चूम कर
धान मुँआँ पकता है
छूकर तेरी कमर
बाजरा लहराता फिरता है
तेरे बालों से मक्का
रेशम चोरी करता है
तेरा अधर चूमने को,
गन्ना रस से भरता है;
सरपत पकड़ दुपट्टा तेरा खींचतान करता है।

बारिश ने जबरन तेरा
यह कोमल गात छुआ है
उस पर मेरा गुस्सा
अब तक ठंढा नहीं हुआ है
तिस पर जाड़ा मेरा
दुश्मन बन आने वाला है
तुझको कंबल से ढक
घर में बिठलाने वाला है;
इतने दिन बिन देखे मर जाऊँगा ये लगता है।

कबसे सोच रहा था अबके
क्वार तुझे मैं ब्याहूँ
तेरे तन के फूलों में निज
मन की महक मिलाऊँ
नन्हीं नन्हीं कलियों से
घर, आँगन, बाग सजाऊँ
पर पत्थर-दिल पागल
आदमखोरों से डर जाऊँ
गए दशहरे कई जाति का रावण ना मरता है।

बुधवार, 17 नवंबर 2010

बस इतना अधिकार मुझे दो

नहीं चाहता साथ तुम्हारे
नाचूँ, गाऊँ, झूमूँ, घूमूँ
नहीं चाहता तुमको देखूँ,
छूँलूँ, कसलूँ या फिर चूमूँ

नहीं चाहता तुम अपना जीवन
दो या फिर प्यार मुझे दो
अंत समय चंदन बन जाऊँ
बस इतना अधिकार मुझे दो

मंगलवार, 16 नवंबर 2010

भारत माँ का घर जर्जर है सब मिल पुनः बनाएँ

भारत माँ का घर जर्जर है सब मिल पुनः बनाएँ
सेवा के कुछ फूलों में हम मन की महक मिलाएँ

बेघर करके बेचारों को
बीत रही बरसात
दबे पाँव जाड़ा आता है
करने उनपर घात
कम से कम हम एक ईंट इक वस्त्र उन्हें दे आएँ
हुए अधमरे अधनंगे जो उनके प्राण बचाएँ

मंदिर मस्जिद जो भी टूटा
टूटीं भारत माँ ही
चाहे जिसका सर फूटा हो
रोई तो ममता ही
मंदिर एक हाथ से दूजे से मस्जिद बनवाएँ
अब तक लहू बहाया हमने अब मिल स्वेद बहाएँ